इच्छाएं हैं, कब.. मरती हैं!
मित्रों, इच्छाएं ही संसार का निर्माण करती हैं और अमृत रूप हो इसे गतिमान भी रखती हैं। इन्हीं पर कुछ लाइने आप के लिए।
लहरें...., कितनी...!
कितनी...!
लहरें..!
अनगिन..! निशि दिन!
कितनी...!
लहरें..!
अनगिन..! निशि दिन!
निशि दिन! अनगिन!
सागर तट,
आकर.. बिछ जातीं,
बिकल हुईं प्रिय!
क्या कहती हैं, सुनो.. किसी दिन!
जीवन गति है, और नहीं कुछ!
तुष्टि कहां! गति में, मिलती.. प्रिय !
देखा, है...,
तुमने, क्या.. इनको
निडर, अभय
निडर, अभय
प्रिय! त्वरितर.. चलते..
वक्षस्थल पर,
सागर... के, इस...!
छुल..! छुल..! बहतीं...?
अरे, नहीं.. रे!
नागिन से भी, और नटीली...,
झोंको को,
अंकों.. में, भरतीं...
उठ.. गिर,
सागर... के, इस...!
छुल..! छुल..! बहतीं...?
अरे, नहीं.. रे!
नागिन से भी, और नटीली...,
झोंको को,
अंकों.. में, भरतीं...
उठ.. गिर,
गिर.. उठ, गिरि, श्रृंगों.. सी,
क्रमशः दिखती..,
क्रमशः दिखती..,
ऊपर उठतीं...इच्छाओं सी
कितनी.! ऊर्जित. ऊर्जित... कितनी..!
रसमय.., मधुमय,
फेन.. भरी,
जस..,
जस..,
मुक्ता.. पहनी,
हिल डुल,
हिल डुल,
हिय.. सागर के, करतीं,
इच्छाओं सी..,
फन.. ले उठतीं, गर्व भरी यह..
छू.. पातीं क्या...,
तट... को,
इच्छाओं सी..,
फन.. ले उठतीं, गर्व भरी यह..
छू.. पातीं क्या...,
तट... को,
सारी...
गिर
गिर
जातीं हैं, मिल जाती हैं
हारीं.., थक कर, थककर हारीं..
हारीं.., थक कर, थककर हारीं..
रेणु तटों पर, पलछिन! पलछिन!
लहरें...., कितनी...!
कितनी...!
लहरें..!
अनगिन..! निशि दिन!
किसी अकिंचन,
की...
प्यारी...
अभिलाषाओं सी यह,
सागर में ही, मिल.. जाती हैं,
फिर उठती.. हैं, फिर.. गिरती हैं,
इच्छाएं हैं, कब.. मरती हैं!
पग दो
ये...
कैसा..! घेरा..?
भीतर... मेरे, मुझे... घेरता,
घिरता... आता, चहुंदिशि मेरे..
संध्या में.. इस, निपट अकेले...।
बूंदे..,
संध्या में.. इस, निपट अकेले...।
बूंदे..,
टुप.., टुप..
मीठे आंसूं.. सी..
क्यों गिरती हैं, बाहर मेरे...
क्यों गिरती हैं, बाहर मेरे...
भीग... रहा मैं, अंदर... कैसे....,
इन बूंदों से, भेद न पूछो।
सांवरी, प्यारी..ये बदली,
याद... में, क्यों!.
याद... में, क्यों!.
ऐसे.. उभरी!
समोती...
मुझको खुदी में, कैसे.. सहमी..!
मुझको खुदी में, कैसे.. सहमी..!
आंख से रोती... प्रिये!
बांह में मुझको है
बांह में मुझको है
भरती,
आज भी है..., स्मृति में,
क्या! शेष.. चिनगारी कोई!
जो फिर है उठती, फिर..है गिरती,
इच्छाएं, प्रिये!
इच्छाएं, प्रिये!
ये.. कब हैं, मरती..!
एक..
समंदर..,
उधम, प्रिये भर..!
उबल..ता, हम सबके. अंदर!
कालिमा की कोई, छाया
कालिमा की कोई, छाया
बची है क्या..? आज भी!
इस तन के भीतर!
खोज रहा हूँ, छाया.. में,
पेड़ो.. से सट कर,
मचल रही...,
होठों.. के ऊपर
कैसे, यह ऋतु,
नव कोपल पर!
बचपन से ले, आज तलक
यह समझ.. रहा हूँ।
जय प्रकाश मिश्र
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