बाढ़यं.. पूत, पिता.. के कर्मे।
मित्रों, दुख होता है, जब हम खुद को ऐसे मोड पर खड़े हुआ पाते हैं जहां हमारे अपने सारे ईमानदारी से किए प्रयत्न अन्य कारणों से धराशायी हो जाते हैं। कहावत सभी जानते है "गाय गुन बछरू, पितागुन गोय, नाहीं ढेर तो, थोड़ई थोर" आज इसी का असर राजनीति के रिजल्ट में होता दिख रहा है। जब खुद तपस्या करना था पद मिलने पर तो घोटालों में फंस जाते हैं, और बच्चों का नाम तपस्वी, यशस्वी रखते हैं। नहीं जानते कि अपने किए पापभार को उनपर अप्रत्यक्ष रूप से डाल देते हैं। इसलिए हमसभी को नीच कर्म से बचना चाहिए।
तपस्या...
तो..,
तो..,
तपस्या...! है,
आसाँ.. नहीं!
आसाँ.. नहीं!
कोई... भी, कर ले...।
किनारों पर, खड़ा हो,
बहती... नदी, के..
प्यास... हो,
और...
सब्र.. रख ले।
एक,
समय.. था,
राजकीया... राशि.. की...,
बहती नदी के
पास.., उसको...,
जनता, जनार्दन...! रूप है जो...
मिल उसी ने,
शौक.. से, अपना समझ कर
घर दिया था,
सौंप कर, बहती नदी के साथ..
उसको... आस में,
विश्वास से
संरक्षण करेगा! जल राशि का वह!
नदी का उस...,
जिससे... सबको, जल... मिलेगा,
थोड़ा.. थोड़ा.. जरूरत को,
जिंदगी... बेहतर बनेगी
थोड़ी हंसी तो मिल सकेगी!
बीच का यह आदमी, है..
अपने ही...
यह मान... कर
ताज... सबने, आस से,
दे दिया था।
पर क्या हुआ
नदी वह सबके लिए.. थी,
उसकी न थी,
गलत फहमी हो गई,
दृष्टि.. रखनी दूर थी,
कोई! चोर.. चोरी, न.. करे,
चोर खुद वह हो गया...
जंगलों का राज, उसने कर दिया।
प्यास.. में, प्रिय..!
मीठे जलों की, सुरक्षा
एक तपस्या था,
छोड़... इसको,
तपस्वी... यशस्वी
मां भारती।।।
नाम..उसने रख.. लिया.
बच्चों का अपने...
यही तो प्रतिघात था,
उन बिचारों के लिए!
बच्चे हैं अच्छे!
लेकिन बिचारे..., क्या.. करें,
कैसे..! धुलें..,
हर, दाग.. उसका,
इतना गहरा...! छूटता ही है नहीं
अब... चादरों से,
चादर पड़ी जो, तन पे उनके...
वल्दियत की, कैसे उतारे
कहां... रख दे।
मुक्ति जंगल राज से
आज! प्रिय..., कैसे "वो" दे.. दे...।
समस्या यह बड़ी है,
छोटी नहीं है,
कुछ भी करे वह, जान दे.. दे...
विश्वास, प्रिय!
जनता... है, ये...
कमजोर.. है, दीन.. है, लाचार.. है
अब प्रिये! कैसे.. वो कर ले।
लुट गईं
वह इज़्ज़तें,
लुट चुका ईमान
जब वो... सोचते.. हैं,
बदलते... हैं, पाले.. अपने,
वोट.. गिरते, बगल घर में।
इतने बुरे हालात!
प्रिय...!
यह, क्या.. हुआ,
सुकुमार सा.. एक प्रिंस.. था
पैदा हुआ,
चम्मचें ले चांदियो की
हाथ, मुंह में,
बोलता... जो
बक बकाबक.. अनावश्यक
बात हर,
कहां... गया...
कोई तो खोजो उसे...,
भाई! कोई तो खोजो उसे...।
देश है, विदेश है,
खेल सारा मेट कर, किधर.. है वो।
जय प्रकाश मिश्र
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