उजाले.. उनके लिए, तो जलजले... थे।

मित्रों, आज कोई कैसी भी शेखी बघार ले पर पूरे विश्व में, समाज में जो गरीब है उसकी स्थिति एक ही है। जी मैने फ्रांस की राजधानी पेरिस, जर्मनी के राजधानी बर्लिन, भारत की राजधानी दिल्ली सभी जगह देखा है, आज की लाइने उन, लोगो को समर्पित है भगवान भी जिनसे जीवन भर नाराज़ रहा आदमी को दोष क्यों दूं। आप जरूर मजे लेकर पढ़ें।

दूर... 
से, देखा... 
अंधेरे...! हिल.. रहे थे,
छाया.., घनी.. थी, लोग.. थे, 
पर, अंधेरे..! सबमें सने थे।
कुछ.. अजब था
मुझको प्रिये! ऐसा लगा,
उस समय... 
उजाले.., 
उनके.. लिए, 
एक, जलजले.. थे।

वो, बहुत.. खुश थे..
दुनियां... में 
अपनी, 
अंधेरों... की.., 
ख्वाइश! कहां.. थी...
प्रिये! उनको, हाल में उस
उजालों... की..
अंधेरी.. थी, नियति.., उनकी। 

सोचता हूँ! देख उनको...
जाने कैसे! अजनबी 
एक.. दूसरे, से.. 
जाति से, धर्म से, बनावट में, 
उम्र में, पद्धति! क्या देश से!  
होते हुए भी
प्यार भर, आबाहु, 
दिलकश! 
अंदाज़ में जिस! 
एक दूसरे को, मिल.. रहे थे।

मकसद, था.. क्या? 
क्यों.. जमा थे, वे.. 
अंधेरों.. में,
निजी था, हां.. निजी था!
कुछ, गलत! 
मैं.., 
क्योंकर.. कहूं! 
वे, बड़े.. थे, छोटे नहीं थे।
विभूषित थे, भूषणों से.. आज के,
कुछ चुनें थे, कुछ भद्र थे, कद्दावर भी थे।


आदमी है, 
आदमी की, हड्डियां हैं,
भीतर! भी इनके, कोई, क्या करे? 
एक दीप्ति है, प्यास.. जलती.. 
आदि से..
लपलपाती... 
प्रणय की, सानिध्य की, 
स्पर्श की, जाने न कब से, 
आंतरिक हम सभी में..
कोई भी हो, वह क्या.. करे।
समरथ कोई, बेरथ.. कोई, 
रथ.. पर कोई...
सब, एक हैं, अंदर प्रिये!  
सच कहूं! देखा है, जिनको।

दूर... से, देखा... 
अंधेरे...! 
हिल.. रहे थे,
लोग.. थे, छाया घनी.. थी, 
अंधेरों में! संग था 
ऐसा! प्रिये 
उजाले.. 
उस समय, उनके लिए, 
सच! जलजले... थे।

क्या.. था? 
वो...
जो... चुप खड़ा था, देर से...
वीभत्स था क्या? 
हर.. 
किसी.. से..। 
प्रश्न है! 
उन, अंधेरों.. में, 
ये.. रोशनी! आई कहां... से,
कोई..., देख.. ले..  पहचान ले,
मुझे तो, सब एक जैसे, लग रहे थे।
याद आया, 
हाथ भी तो, आंख.. है,
स्पर्श भी तो, आंख है..
स्निग्धता.., 
सुडौलता.. की, आंख 
ही.. तो, हाथ... हैं।
गर "चक्षु"  ही हो, आदमी में 
ये.. 
अंधेरे..., 
फिर कहां, प्रिय! 
यह सभी.. कुछ, बेकार... हैं।

जिंदगी है, यह.. प्रिये 
घुप अंधेरों में, 
छांइयों में, 
पात के.. उन सड़ चुके, 
छप्परों की, शरण... में..
फट.. रहे, टांगे.. हुए 
काले प्रिये! 
उन प्लास्टिक, तिरपाल.. में
नीचे पुलों के, रह रही है।

उन अंधेरों में, जो खड़ी है,
गौर से, देखो उसे...
वह! त्रासदी है..., 
पास मेरे, जो खड़ी है! 
कच्ची उमर है..
क्यों कहूँ कचनार! उसको...
ताप से जलती... तवी है...
पूछते हो, 
मुझसे... क्यों? पूछो उसी से...,
सच सुनोगे! सुन लो उसी से...।

परिवार थे, 
बरसात.. में, पीछे पड़ी, 
बौछार.. में
इन तपतपाती गर्मियों में
उमस में,
बच्चों को ले, बूढों को ले, 
सामने....
प्रिय!  सभी के 
ब्रिज के नीचे, सर्दियों से रह रहे वे।

कोइ.. पूछंतर है? 
कहीं.. इनका, कौन.. हैं ये? 
खाते हैं क्या, रहते.. हैं कैसे
और.... 
कैसे..., जी.. रहे ये...।
दूर... से, देखा... 
अंधेरे...! 
हिल.. रहे थे,
लोग.. थे, छाया घनी.. थी, 
अंधेरों में! संग था 
कुछ.. 
प्रिये ऐसा! उजाले.. 
उस समय,  
उनके लिए, तो जलजले... थे।

जय प्रकाश मिश्र


 


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