काय-काया दोष से वह दूर है।

मित्रों, संसार और हम दोनों विचित्र है! कैसे अपने स्वरूप में अपने को देखें इसी पर कुछ लाइने आप के आनंद के लिए प्रस्तुत है।

वह! 
सत्य है, प्रिय! 
खिलखिलाकर हंस रहा,
तरल.. है, स्वभाव.. से, 
मगन.. कैसा!  
कमल.. हो! 
पूर्णता... ले, खिल.. रहा! 

आनंद में, 
स्वच्छ.., निर्मल.., 
सांसारिक हवाओ के बीच भी
मुस्कुराता, 
खिलखिलाकर हंस रहा। 

देख!  
कैसा, मस्त! 
तटस्थ.. जग.. से
आनंद में, वह विचरता, 
यथार्थ... जीवन, जी... रहा।

अवसान!  
उसका, ना.. प्रिये! 
वह... दिव्य है, 
अनुगत है तुमको.., आंख से, 
हृदय से...
पर प्रिये...! वह है, परा*।
*चमत्कारिक या सोच से ऊपर

स्थान से, समय से, वह.. बिलग है।
अवतमस-का* , 
पुंडरीका*, 
हर कलुष* से दूर।
प्रिय..! 
यह देश..है,  यह है जहां...
दूर.. हमसे, शांत, स्थिर.. सुखावटी* है, 
अम्बरीशा*..,
यातना से, कामना से 
दूर, सीमित...
अनंता*....।

काय-काया दोष* से 
अति दूर.. स्थित..! शून्यता.. में सुगंधा..! 
कैसे.. कहूँ! 
सौभाग्य.. का भी, भाग्य.. है, 
फैला.. पड़ा
उस पद कमल के, पदों.. में
जो तुम्हे है दीखता, 
वह! सत्य है, प्रिय! 
खिलखिलाकर हंस रहा।

मार्ग उसका कठिन कितना, 
वज्र के उच्छेद* सा
पर विमल 
सुंदर, हर्ष देता, 
क्रमिक, कितना सुंदर, सुगम था।
भाव: आध्यात्मिक उत्थान कठिन, लेकिन आनंददाई।

कोई खड़ा था, पार्श्व में, 
अदृश्य सा, 
इंगित सभी कुछ कर रहा 
हर मोड पर, 
छाया.. सरीखा
मार्ग निर्देशित किए, साथ उसके था लगा। 
भाव: आध्यात्मिकता में शक्तियां अदृश्य रूप से सहायक हो जाती हैं।

संसार, 
यह.. क्या? 
एहसास.. है! जैसा... हुआ? 
हर एक का, यह 
अलग.. प्रिय! 
अनोखा, निराला, बहुरूप सा...,
इस लिए यह सत्य ना... है,
हर किसी को एक सा...।

वास्तविकता!  
कुछ... नहीं...
मानसिक दर्पण में, छाया.. 
विश्व की है, पड़ रही।
क्रिया.. है, मस्तिष्क की, 
कितना.. जुड़ा, कैसे.. लिया
छाया को उस, 
इसलिए यह गौण है, 
जुड़ना मना, 
मन का इससे..., 
दूर से
इसे.. देखना...
तटस्थ.. होकर, 
सबसे सुखद है, श्रेय प्रद है! 
यही तो वह मार्ग है, 
उस सरोवर तक पहुंचने का
सत्य का वह कमल जिसमे खिल रहा।

वह! सत्य है, प्रिय! 
खिलखिलाकर हंस.. रहा,
मगन.. कैसे, तरल.. हो, स्वभाव.. से
स्वच्छ.., निर्मल.., आनंदित, स्वयं.. में, 
कमल.. हो, 
कोई सरोवर बीच 
प्रिय, पूर्णता... ले, खिल.. रहा।
देख कैसा, मस्त! है, तटस्थ.. जग.. से
आनंद में वह विचरता, 
यथार्थ जीवन 
जी रहा।


जय प्रकाश मिश्र
अवतमस-का* तमोगुण से दूर सात्विक
पुंडरीका* ईश्वरीय गुण वाला
कलुष* बुराइयां, गंदगी 
सुखावटी* सुख का स्थान स्वर्ग सा 
अम्बरीशा* आकाश में स्थित परा गुण, शक्ति संपन्न।
सीमित-अनंता* सूक्ष्म से अति सूक्ष्म पर विपुल शक्ति वाला
काय-काया दोष* अवस्था गत, भौतिक परिवर्तन
वज्र के उच्छेद* हीरा सा कठोर काटने में

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