बरसता सावन वो, छुल.. छुल..
मित्रों, जीवन वर्तमान और स्मृतियों का एक कॉकटेल है। जो भविष्य के रुपहले पर्दे पर आयोजना के लिए परी लोक में चक्कर काटता है। इसी पर अति संक्षिप्त लाइने आपके लिए।
एक, एहसास...
तेरे, साथ..
ये..,
कैसा.. उभरा..
पकड़, तेरा हाथ..,
तेरी.., गलियों में, मैं..., खो.. हि गया।
संदली*.. महक.., ये....,
ले.. के, मुझे
किस जगह.. आई..,
घुल गया, इसमें..
कितना..! मैं
कितनी..!
मुझमें, ये..., भर आई...।
संदली* चंदन की महक
गुनगुनापन..,
ऐसा...
तेरी हथेली... का,
छू.. गया,
भीतर, किस जगह.. मुझको,
भूलता ही, नहीं..,
उम्र, "सफर..ए जहान*" की... आई।
* दुनियां छोड़ने का वक्त
छलकता.. यौवन
वो.. तेरा,
बरसता.. सावन.... ये, छुळ.. छुल
मत पूछ! कितना
मुझे, कैसे!
कहां, तक! भिगो... के गया।
एक, एहसास...
तेरे, साथ.. ये, कैसा.. उभरा..
पकड़, तेरा, हाथ..
तेरी.. गलियों में मैं..., खो.. ही गया।
पग दो:
ये.., बह.. रहे,
हवा.. के संग, उड़.. रहे,
सूखे…, हुए,
थोड़ा मलिन! जो दिख रहे,
नीचे.. पड़े , ये..
उन.. डालियों…. पर...
सच प्रिये..!
कल तक, खिले.. थे,
महकते….
इस, फ़िजाँ… को,
रौशन… किए थे।
आज!
सुबहो.. सुबह, ही,
गुल…नये!
आगाज! करते, जिंदगी का
गुनगुनाते..!
कितनी… खुशी, कितनी.. तमन्ना!
लिए, प्रिय!
डाल…, उस ही..
मुस्कुराते खिल.. रहे थे।
वो फर्श… पर थे
आज
बस,
जो ’कल’ खिले थे।
रस्म… है,
खिलना… यहां,
झरना... भी है,
रोना, नहीं…! तुम देख इनको!
जब, फूल
चुप...
आदमी,
क्या फूल को, डाली न प्रिय है
जश्न.. है, ये… जिंदगी!
फूल.. सी
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