दीप.. भी, पनघट*... हुए, परिदृश्य से, गायब.. हुए,

मित्रों, आप सभी को दीपोत्सव 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं। यद्यपि दीप भी पनघट की तरह बचे नहीं पर स्मृतियों में जगमग उमंग भरते हुए आ रहे हैं। इन्ही पर एक शब्दों की झालड़ी आप के लिए, आनंद लें।

दीप.. भी, 
पनघट*... हुए, 
परिदृश्य से, गायब.. हुए,
सहज.. थे, सुंदर... हुए, 
अनुपम..हुए  
अब प्रिये... झालरों... में, 
लड़ी.. बन, 
दीवारों पर ये,... टंग गये।

सज रहे, बाजार.., 
विद्युत बल्ब.. से,
गलियां पटी हैं, 
झिलमिलाती 
लिट-मिनी... से।

दीप... से 
दीपावली, मनते... हुए
देखे..! प्रिये... 
बोल कितने साल, 
हमको... हो गए।

दीप पहले अनगिनत..
पुष्प से, 
घर गांव में, मुझे दीखते थे,
अब गिनतियों के, 
शहर में भी बच रहे।
सच सुने, 
अब मात्र पूजा पाठ तक, 
ही.. रह गए।

दीप.. 
अब.. ये, 
आज, बस निज 
आकृति तक, बच.. रहे...।
यह, सज... रहे हैं, 
कागजों... पर,
देख कैसे..! 
वर्चुअल होते हुए, 
सच! ... 
चलन से बाहर हुए।

मेरी, 
पोती.. बोली, 
तुतुल करती, 
दादू तुम्हीं थे, 
मोम बत्ती, पहले जलाए! 
सबसे.. पहले 
दीप.. दादू! तुम्ही थे जो छोड़ आए, 
दीप को तुम भूल आए, 
सच सुनो...
अपने दिनों में।

जेन... एक्स थे 
पापा... मेरे, 
लड़ी.. बिजली की जलाए,..।
कालिख, जनन के 
माध्यम ये, किताबों में हम पढ़ें,
इसलिए... हम 
तार्किक हैं, 
वर्चुअल पर उतर आये।

इसलिए मैं चाहता हूं
सजा दूं, 
इन्हें कागजों पर,
चित्र! में, 
और जला.. दूं!  
इन्हें... कूचियों.. से
फिर 
तुम्हे.. प्रिय!  
भेज दूं! प्यार में,
दीप अब..प्रिय! 
इसी के काबिल बचे।
दीपोत्सव आप के जीवन का और मन बुद्धि का अंधकार हर ले।
पनघट * पुराने समय में कुआं या नदियों पर पानी भरने की जगह जहां शाम को युवतियां मिल ठिठोली कर लेती थीं।

पग दो

तैरना.. तो, 

चाहता... हूं,

पग, कहां! पर, पास.. मेरे,

है, विकट यह राह! प्रिय...

अब, कहां... 

कोई..., साथ... मेरे।


बज्र.. की, दीवार.. सा, 

जीवन.. खड़ा 

यह! 

रोकता.. है,

संग, कल्पना... का 

यह... हथौड़ा! मात्र.. मेरे! 

पैदा करूं! कैसे..., प्रिये! मैं.., 

पुराना वह, हौसला,

तोड़ दूं, दीवार 

जीवन.. की, मैं... यह,...

और आ मिलूं! 

उड़ता हुआ, प्रिय

मुक्त तुमसे..! 

जय प्रकाश मिश्र

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