सतपुड़ा.. के, पहाड़ों... सी, जिंदगी यह!
मित्रों,
सतपुड़ा.. के, पहाड़ों... सी,
परत में, चिपकी हुई,
यह सभ्यता.., यह जिंदगी...,
समय.. के, पट बदलती..,
नवीन होती, नित्य ही,
दिखती, नहीं.. है।
कहां थे हम, बचपने में,
कहां हैं हम, आज!
इसको, गौर से, प्रिय..
गौर.. करना!
दूर.., कितनी दूर..., चल.. कर
आ.. गये हम, नोट.. करना।
क्या.. गांव था! क्या.. शहर था!
आदाब करता, सहज जीता..
कमी.. में भी, पनपता..,
सौहार्द्र.. रखता!
आज, क्या है!
नजरों से अपने तौलना,
कुछ.. नहीं,
अब.. बचा है, प्रिय! देखना..।
पालगी.. जो, सुबह.. की थी,
पालकी.., जो खेत.. में थी,
गाय, जो हर, घरों में थी,
वो, गाय, बछड़े,
बैल, बकरी, हल, जुआठा
बरहा, बरही, नाथ, पगही
काका, काकी और भौजी!
कुछ नहीं है,
पूंछ...! कोई, एक.. भी!
किसी...,
दरवाजे..., नहीं... है।
इस लिए एक़ कथा सुंदर
समय हो तो.. पढ़ ही लेना
अन्यथा छोड़ो, इसे
तुम.., आगे.. बढ़ना..।
एक.., मनु थे,
आदम.. कहूं! या... आदमी!
आये, यहां..,
चिर काल.. पहले..,
अकेले..,
वह, बच गए थे, प्रलय.. से।
बस एक साथी,
साथ में,
थी..
संगिनी..,
मधुरा.., प्रजननी...
कोमल, सुघड़ पयस्विनीं,
बहार..! प्रिय... मन. रंजिनी,
अंग संगिनी, शतरुपिनी,
फैली पड़ी इस प्रकृति सम
शतरूपा थीं, वो।
देख कर,
इस, नव्य.. नवला..
प्रकृति.. को, वह.., चकित.. थे,
अत्यंत, खुश.. थे।
क्या नदी थी! स्वच्छ! मुख थी!
निर्मला, जल हिमालय का, ले.. ढुनकती!
आश्वस्त.. बहती, मोड पर भी,
विकल.. न थी,
सहज.. थी।
प्रिय!
कुंज थे,
मह मह महकते!
रस, स्राव.. करते, मोहते. मन, खींचते।
गौ.. थीं, संग बछरूओं,
कुलांच.. भरती
दुग्ध सरिता
ही लिए
करुणामयी, आश्रय, तरसती..।
अपना लिया, उस धेनु को,
आश्रय दिया, रक्षा किया...
पय पान कर, उस धेनु का,
विस्मित..! हुआ।
मीठा, मधुर, अमृत! ही था,
प्रफुल्लित!
गोवंश को रक्षित किया।
उस प्रकृति प्रांगण,
रच.. गये वे..
बीच... में,
वहीं.. बस.. गये वे..
छोटा.. घरौंदा,
तृण पत्तियों का बना कर,
वनराजि पर उस,
रीझते.., प्रिय! रह गए वे...।
जो मिला, झर.. कर, गिरा..
भू.., पटल पर,
मीठा मधुर.. स्वास्थ्य प्रद,
चख उसे,
हर्षित हुए, पोषित हुए।
प्रकृति के संग, एक.. थे हम,
मनुज.., वंशज
मनू के..।
कुछ, दिन ही.. पहले!
बचपने में.. खुद ही अपने,
पल रहे थे, दूध, फल, प्रिय सब्जियों पे।
यह क्या हुआ, इतने दिनों में,
रेडीमेड, सबको भा रहा,
सब, बिक.. रहा,
देख कैसे! पैकेटों में।
बासी.., तिबासी..
थैलियों में, ठूंस कर, शीतली कृत...
ताज़ा लगा रैपर प्रिये!
आज यह, बाजार.. में।
आज प्रिय! हम,
शत्रु.. हैं,
अपनी प्रकृति के,
अपनी ही प्रकृति के।
एक सच कहूं!
सुविधाओं के चलते..
इस पश्चिमी...
सभ्यता की डोर चढ़ के।
आओ चलें,
इक बार फिर से,
प्रकृति के प्रिय, आंगना उस..,
मां.. है, वो...,
गिले शिकवे दूर कर,
हम...
गले मिल लें, बात कर लें
कुछ अपनी कहें, कुछ, उसकी सुने
राजी! उसे, प्रिय अब भी कर लें।
जय प्रकाश मिश्र
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