उम्र के तकाजे बचे क्या!
मित्रों, जीवन कई स्टेप्स से मिल कर बना है, सभी चरण अच्छे हैं। हम हमेशा वही है, भीतर बदलाव आता रहता है और क्या होता है इसके लिए आगे की लाइने पढ़ आनंद लें।
सब.. उम्र के, तकाजे.. हैं
कुछ... बात, नहीं.. बनती,
अंदर.. ही, घुप... हुआ हूं !
अब, फुहार... नहीं जंचती।
भाव: पुरुवाई की ठंडी हवा जो बचपन और यौवन में दुख देती है, तीसरे पन में जोड़ों में दर्द भर देती है।
कुछ.. याद तो, आती है
नींबू सी तरावट, उसकी,
अब.. ये लव ही हुए ऐसे
सच..! प्यास नहीं लगती।
भाव: जीवन की हवस इंद्रियों की शक्ति पर टिकी होती है, अशक्त तन स्वयं में सीमित हो जाता है।
पैरों.. से, सिली... धरती
आंखों.. में लिए तितली,
उड़.. पाऊंगा, मैं... कैसे
तेरे.. चंदन की, बगीची में।
भाव: एक समय आता है जब चलना फिरना दूभर हो जाता है। मन तो उल्लसित होता है पर, दुनियां के सारे सुख आप नहीं चख सकते।
सहमा.. है, दिल... मेरा
उन दहलीज की यादों से,
खुश कितना हुआ था मैं
उन... पाक, निगाहों.. से।
भाव: संसार का लहलहाता सौंदर्य, एक सीमा पर अर्थहीन हो जाता है। लेकिन सच्चा सुख पवित्रता से तटस्थ भाव से इस संसार को लेने पर ही मिलता है। जहां अधिकार नहीं वहां जिम्मेदारी भी नहीं।
जय प्रकाश मिश्र
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