पूछता हूँ, सच! बताना, मित्र! तुमसे...
पूछता हूँ, सच! बताना,
मित्र! तुमसे...
इन, जीवनों.. का, राज.. क्या है?
वह नृत्य... है क्या!
अनवरत!
जो हो रहा है, सबके मनों.. में।
मित्र! तुमसे...
इन, जीवनों.. का, राज.. क्या है?
वह नृत्य... है क्या!
अनवरत!
जो हो रहा है, सबके मनों.. में।
तनों.. में,
सागर.. हृदय, वन,
जंगलों.. में,
पार..., इस पृथ्वी परिधि के,
ऊपर... वहां,
तारागणों.. के, उपवनों में..।
पार..., इस पृथ्वी परिधि के,
ऊपर... वहां,
तारागणों.. के, उपवनों में..।
इस.. सूर्य में, उस.. चन्द्र में,
नक्षत्र.. अंदर, नक्षत्र.. बाहर..
आकाश.. मंडल,
बीच..
सारे... सदस्यों... में।
सब बंधे, एक दूसरे संग...
नाचते,
किस! प्रेम.... से,
देख, कैसे!
आकर्षण बलों के रूप में,
बांधे हुये हैं, स्नेह के ही बंधनों में,
अदृश्य... ये, इन..., रज्जुओं... में ।
आकार ले, वृत्तीय.. प्रिय!
सब,
नच.. रहे हैं,
नाच... कैसा...!
मनोरम, दिवस.. निशि.. प्रिय,
अनथके, ये.. कर रहे, आनंद.. में।
नाचते...
परमाणु, अणु, प्रोटॉन..
पॉजिट्रान.. सब..
इलेक्ट्रॉनो..., संग..
देख कैसे प्रेम से...
विपरीत हैं, गुण धर्म में।
क्या... नहीं! हम सभी.., भी,
आज.. प्रिय...
निज...
विपरीतता.. के बीच ही,
कुशल.. रख, एक.. दूसरे, की..
नाच.., नच.. सकते, यही.. हैं
जीवनों... में।
समस्या इनको नहीं है,
समस्या सबको नहीं है..
फिर समस्या,
इतनी बड़ी, इन युद्ध की..
इतनी बड़ी.., हर जगह
प्रिय क्यों पड़ी है, इन दिनों में।
प्रिय क्यों पड़ी है, इन दिनों में।
जय प्रकाश मिश्र
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