शोक कैसा! उसके लिए! कुछ नया बुन..!
मित्रों, प्रियजन विछोह एक अकल्पनीय पीड़ा और वेदना भरा अहसास होता है। जिन लोगों को यह दर्द है, उनको समर्पित यह लाइने इस असार संसार के दृष्टिगत एक धुंधलिका आप सब के आनंद के लिए प्रस्तुत हैं।
यह, कली...,
आ..!ह रस, भरी..,
प्रिय..! कमलिनी की
कल.. तक, नहीं.. थी,
सतह से ऊपर,
कहां.. यह, दीखती.. थी,
आज! रंगत.. गुलाबी, ले
खिल... रही;
कल.. तक, रहेगी..! क्या.. प्रिये!
इस रूप में,
यह...!
अधखिली..! बस.. पूछता हूं!
इससे, ज्यादा.. कुछ नहीं!
फूल.. बन कर
खिलेगी.. यह! सच प्रिये!
कोई कुछ करे, ना करे, इसे छोड़ दे;
महक कर, सौरभ लुटा,
परिदृश्य में
फिर,
क्या... बनेगी?
बताना, यह कहां होगी?
अरे!
इसमें, शोक! कैसा,
खिल चुकी, सौरभ लुटा,
सौंदर्य भर,
ले.., दे.. चुकी, वह, जी.. चुकी।
इसके आगे और क्या...
आई जहां से, वहां होगी।
पूर्णता की परिधि भी, प्रिय!
यही होगी।
सोचना क्या!
चक्र है, यह सतत चलता,
यहां, तुम.. हो, आज !
वह..! कल, यहां.. होगी।
कौन किसका है, प्रिये..,
यह.. रूप, किसका..!
सब नित बदलता, नया होता,
मिट्टी ही था, मिट्टी ही है,
मिट्टी.. में मिलता।
यादें भी.., क्या है?
कहां रहतीं?
कब तक रहेंगीं, निश्चय मिटेंगीं!
यही है, गुण धर्म इनका..।
जीवन है ये,
एक्, फलक.. खिलता,
इस तरफ,
दूसरा, उस तरफ, मिटता।
समय की इन चादरों पर...
प्रिंट.. होता,
धुधुल होता, हर क्षण सिमटता।
पुनः खिलता...
सच, प्रिये! हर क्षण बदलता।
इस लिए तो कह रहा हूं,
शोक मत कर!
उसके लिए! जो नहीं है, अब!
कुछ.. नया बुन..!
सुंदर... घरौंदा..,
वह...
कुछ नहीं था,
उस कमलिनी.. सा
खिलखिलाता... बुलबुला...,
अब! नहीं दिखता,
है कहीं,..., प्रिय! खिल चुका...।
रंग गुलाबी, जिंदगी का, भर चुका..।
बस, समय.. की, चादर है सब,
हर ओर फैली..
सच प्रिये!
जो जहां.., दीखती...
नित सिमटती, फैलती, आनंद भरती,
लिपटती, इससे अधिक, कुछ भी नहीं।
वह, कुछ.. था, नहीं,
सच.. प्रिये!
जो, नहीं... अब! दीखता....।
दुख छोड़ रे!
जन्म उसका, सुरभि... के घर हो चुका।
जय प्रकाश मिश्र
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