आंसू! प्रिये, तब निकलते थे, जब टूटते थे, स्वप्न मेरे
स्वप्न थे, कुछ बहुत, गहरे..
समय.. की, नद.. में, बहे,
आंसुओं, में भीग.. कर सब
प्रिय!.. देवता.. के सिर चढ़े।
भाव: कुमारावस्था या कैशोर्य तानो-बानो का एक संजाल होता है, कितने बितान तनते हैं, उठ गिरते हैं। आखिर में एक जीवन साथी के सिर, पर समाप्त हो जाते हैं। जीवन स्थिर हो जाता है।
पर, पास.. हूं, मैं...,
आज खुश..
उन देवता के चरन में,
खास हूं मैं,
शख्शियत हूँ
वह.. स्वप्न थे, जिस.. उम्र के
उस.. उम्र के संग, बह.. चले।
स्वप्न अपने घर चले।
भाव: कई लोग इस सपनों के लिए व्याकुल और दुखी हो जाते हैं। पर जीवन नाव सजते ही वह सब गोण् हो जाता है। और जीवन साथी के साथ एक गुरूता और प्रतिष्ठा मिलने लगती है।
आंसू! प्रिये, तब निकलते थे,
जब.. टूटते थे, स्वप्न मेरे...
सोच में, कहीं बालपन.. था..
वे.. सजीले, स्वप्न.. ही,
उस समय...
सब.. कुछ... थे, मेरे...।
भाव: किशोरावस्था या अधपकी उम्र में, तमन्नाओं की आंधियों चलती हैं। कुछ बह भी जाते है। और सारे ही अनेक स्वप्न पाले होते हैं और ज्यादातर टूटते भी हैं। दिल से लोग लगा भी लेते हैं।
जीवन है, ये..
खिलौना तो नहीं है,
रंगीन कोई! उड़ता रहे,
पतंगों... पे,
यथार्थ है, यह!
स्वप्न से यह, दूर... है।
पर, सुखद.. है, दुख सुख मिला,
प्रिय! स्थिर तो है..।
भाव: जीवन एक वास्तविक धरातल है, रंगीन तितली के पंख नहीं यहां, दायित्व, कर्तव्य और निष्ठा की खेती करनी पड़ती है। यह डगमग नहीं स्थिर होता है गृहस्थी के रूप में।
उस स्वप्न का पिय!
क्या भरोसा ? तब था नहीं,
अब, नहीं... भी, हो!
जो था नहीं, काबिल की आता सामने
वह स्वप्न केवल आंसुओं तक,
उसके आगे, कहां टिकता
भावना था, सूख जाता, अंत पाता।
भाव: भुलावे में और रूप सुंदरता के ऊपर जीवन नहीं चलता, राग, मिथ्या या कच्चा प्रेम होता ही नहीं, वह सामने संघर्ष में भाग लेता ही नहीं। केवल भावुकता में आंसू बहाता है। उसका जीवन वहीं तक का होता है।
जय प्रकाश मिश्र
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