चौदसी की, रात को, मुंह..अंधेरे अंतिम.. प्रहर..में,
मित्रों, हम दिवाली के पूर्व हम घर आस पास साफ करते हैं, और एक रस्म दरिद्रता को खदेड़कर बाहर करने की भी होती थी। पर मन की सफाई भी तीज त्योहारों पर करनी चाहिए।
याद
है.. मुझको, प्रिये
दिवाली.. से ठीक पहले
चौदसी... की,
रात को,
मुंह... अंधेरे
अंतिम... प्रहर.. में,
खेदना*..
एक.. क्रिया थी।
सामान्यतः प्रिय!
सभी.. घर में।
उन..!
दुर्निवारक श्वापदों को
दारिद्र्य को,
रोग.. को, अनिष्ट.. को,
हर... अमंगल को..।
सूप.. लेकर
बजाते..
दूर.. तक, उन जंगलों में..
जला कर,
उस
खेदने, के सूप को, लौटती "मां !
अल सुबह, मुंह अंधेरे!
आस में इस..
सारी बला,
सारे.. असुख, अब नहीं होंगे,
साल भर।
चैन से, सब रह सकेंगे,
आनंद में जीवन
जिएंगे,
साल भर।
पर
क्या पता था,
मन.. में, कुछ.. के,
तलपटों में, तहघरों में,
अंधेरों... में, छुप.. गए वे ,
सभी.. श्वापद, चुपके.. चुपके..,
और निकलते वे बहुत धीमे
दबे कदमों, चालते थे
भूमि को, सच
निरंतर प्रिय!
और गहरे!
मचा देते, कंप क्यों.. भूकंप भी
दुःअवसरों पर..।
मां बिचारी,
मौन होकर सोचती,
कौन सा कोना, बचा था
चौदसी को,
कहां यह श्वापद छुपा था।
इस लिए तो कह रहा हूँ
साफ मन भी जरूरी है,
करें अपना,
तीज त्योहारों से पहले।
सफाई! घर की तो कर लें,
मन! को न छोड़ें,
जरूरी है।
अन्यथा इस दिवाली
का अर्थ ही है
क्या प्रिये?
जय प्रकाश मिश्र
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