खिलौने.. थे, खेलता..., जिनसे.. रहा, मैं...

जीवनों... के..
तह.. 
में.. देखा, 
कुछ..., नहीं.. था,
सच कह रहा हूं,
अंत..! सबका...एक.. सा,
प्रिये..., 
निर्जन.., शून्य... था। 

संभलता.., 
सजता.., संवरता..,
सुख, दुखी होता, जीवन ये, बीता...;
मैं, कहां.. था, जानता!  
ऐसा, है... होता! 
छोड़ देगा साथ, अपना हाथ!  
भी..., 
प्रिय! एक दिन..
मुंह बंद होगा, 
नाक की नलियों सहारे
मैं.. जिऊंगा..! 
जीवनों... के..,  तह.. में.. देखा, 
कुछ..., नहीं.. था
अंत सबका, प्रिये... निर्जन, शून्य था।

खिलौने..., 
सच! खिलौने.. थे, 
खेलता..., जिनसे.. रहा, मैं... 
जिंदगी... भर, 
मतलबी, सब स्वार्थी, 
बेकार.. थे, 
दे.. दिया.., निज.. समय 
जिन पर।
सच, सुनो तो.., सुनाऊं! 
जो.. मधुर... था,
कटु भी, वही.. 
था।

हवाएं.. थीं, 
फ़िज़ाए..थीं, रागिनी.. थी
राग.. था, 
कर्तव्य था, दायित्व था, 
अधिकार था।
समय के, प्रिय पेड़ पर
सब.., 
गुल... खिले थे, 
समय के ही धरातल पर, 
झर.. गए।
अंत में, प्रिय एक दिन!  
मैं अकेला हूं बचा! 
जीवनों... के, तह.. में.. देखा, 
कुछ..., नहीं.. था।

सच कह रहा हूं, 
अंत..! सबका...
एक.. सा,
प्रिये..., निर्जन.., शून्य... था। 

मैं, खुद.. नहीं हूँ 
प्रिये..!  अपना.....
मस्तिष्क का सब, राज.. है...
कौन.. था मैं, भूलता.. हूँ! 
कौन हूँ मैं...! पूछता... हूँ! 
रास्ता है कौन वह, 
जाना मुझे है, प्रिये...जिस पर...
सामने है, कौन मेरे, 
दर्पण से अपने, पूछता.. हूँ! 

संयोजना थी, नियति की, 
मैं मान बैठा... 
मैं..., ही था, 
यह.. गलत था।
आज, कुछ.. कुछ.., दीखता है...
कुछ नहीं, जीवन ये था ! 
सच! कुछ नहीं, जीवन ये था! 
कोई खिलौना था, 
खेल कर बस रख दिया,
और चल.. दिया।

जय प्रकाश मिश्र




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