तरलता होगी हृदय… में तभी तो चुंबक… बनोगे,

मित्रों, आप सभी को रूप चौदस की बधाई। करुणा, प्रेम और सौंदर्य मूल शक्तियां हैं इन्हीं पर आज की लाइने, आप पढ़ें और आनंद लें।
तरलता होगी हृदय… में 
तभी तो चुंबक… 
बनोगे, 
बह… सकोगे 
साथ.. मेरे,
प्रीति मेरी खींच.. लोगे,।

विपरीतता… 
को जीत कर तुम
झुक.. सकोगे,
निज बाहुओं में,
भार मेरा ढो.. सकोगे,
अन्यथा कैसे... रसोगे..।
 
ठोस.. हो तुम! 
बनावट.. से, याद रखो! 
प्यार खुल.. कर 
तुम.. करो! 
संभव… नहीं है।
शुष्क ही रह जाओगे, प्रिय! 
कुछ नहीं, 
तुमको मिलेगा, जिंदगी.. में, 
इसलिए, भीतर बहो, अनुराग… ले.. 
जिंदगी का रस मधुर, 
तभी.. तो, तुम.. पाओगे।

कैसे, लिखोगे.. दिल पे मेरे
यह.. शीतलक है, 
चिपकता, 
रुकता.., यहां पर, कुछ.. नहीं है।
इसलिए तो कह रहा हूँ
शब्द, चुंबक के बनाओ
चिपक.. जाओ..
रास्ता 
कोई... दूसरा 
बिल्कुल.... नहीं है।

लिख.. नहीं सकते हो, तुम.. 
किसी, शीतलक पर..
अगरकर, तो…
एक चुम्बन, 
चुम्बकों सा चाहिए, 
इसके लिए।

मेरी न मानो देखना तुम 
अपने फ्रिज में,
एक अक्षर के लिए भी, 
सच प्रिये! न्यूनतम, 
एक चुंबक 
कम से कम तो चाहिए।

आकर्षण जहां होगा, 
हृदय...
 होगा
तरलता,.. साथ होगी,
खींच… लेगी, शक्ति तेरी, 
सोख… लेगी, सूक्ष्मता, 
नृत्य… तूं 
करने लगेगा, साथ उसके..
यही तो है, 
कर रहा, उसकी सुरक्षा आदि से।
भाव: नारी शक्ति अपनी सुरक्षा आदि काल से अपने, आकर्षण और कोमल चितवन से करता आया है। पुरुष अपनी सारी शक्ति का अंतिम प्राप्य वहीं विसर्जित कर धन्य मानता है।
विज्ञान है यह, 
टिक.. रही है
अपनी, पृथ्वी... बीच में इन 
ग्रहों... के प्रिय! घूमती 
घुमाती है साथ में
इन सभी को
यही तो रसगर्भ! इसका। 

कोर में, पिघला हुआ 
संवहन करता 
हृदय इसका 
तप्त है, परितप्त है,
लावा,... सरीखा, हो गया है,
हम सभी के पाप से,
संतप्त है यह, क्या करे..
रास्ता बस यही इसका।

पग दो: 
सोचना, सौंदर्य क्या है? 
परावर्तन…! 
है, क्या…! 
यह, उस पृष्ठ.. का
जो, कुछ नहीं लेता है मुझसे! 
पर, सोखता है, 
सूक्ष्मता से 
अंश वह, अनिष्ट का
बस इस लिए सुंदर वह
सुखकर है वह, 
प्रिय! माता, सरीखा।

जय प्रकाश मिश्र


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