उसने कहा था।

आप सभी सुहृद को धनतेरस की हार्दिक बधाई।

मित्रों, किशोरावस्था और उसकी यादें जीवन भर  के लिए ऊर्जा स्रोत होती हैं, "उसने कहा था" एक कहानी थी और एक वाक्य था 'तेरी कुड़माई हो गई' सभी को याद होगा। वह जीवन उत्सर्ग की कथा। इसी पर यादों के सुख पर एक छोटी सी नवलिका-आशब्दी आप के लिए।

शहर तो यह! पुराना.. था, 
नया.. न, 
था..
याद... है,  अच्छी... तरह! 
मैं.. कब, मिला था,
बहुत.. छोटा, 
उस समय, 
मैं.., 
यह, बड़ा..... था।

इतने.. बड़े, पूरे दशक... को,  
कल्प... को,
गुजरते...
बस, एक... क्षण में, 
भागते..., 
मैं..., देखता हूं,
विचारों में, घूमता, सिमटता, 
समय.. की, इन 
डिब्बियों में, 
उछलता..,
स्मृति.. झरोखों पटों को मैं खोलता 
प्रिय!  
बंद करता, डूबता ..हूं।

यह, लास्य! कैसा? 
हूं.. कहां! 
काल के अपराजिता.. 
इस पटल को, मैं.. खोलता, 
अंदर.. समाता, बारिशों.. सा,
भेदता, रिस.. रहा हूँ 
हूँ! कहां! 
कुछ 
सोचता, मैं, 
उसके पहले, घिर गया हूँ! 
फिर उन्हीं, निश्चिंत, 
विचि* की वीथियों* कल्लोल*.. करता,
मुखर होता, सुन.. रहा हूं
उन सभी को, पास.. से
अनुभूति.. सच्ची 
मिल रही है, 
क्या है ये... लोक कैसा! 
आज भी, प्रतीक्षा! मेरी ही करता
क्या! खड़ा था  इतने दिनों से, सोचता हूँ।

अनुभूतियां है, यादें हैं, कुछ! 
बालपन की, आज भी
जीवित... प्रिये! 
ताज़ा तरीं बिल्कुल हरी. 
आज सी.. ये,
उन्हें ही, उस, रूप में 
मैं... खोजता! खो गया था,
काल की उस कोठरी में
सेंध... करता।

बह चुकी है, दूर गंगा, संगमों से, 
जानता.. हूँ,
मन, क्यूं मेरा,  फिर आज भी
उन किनारों पर, 
रेत कण, 
फिर वही, प्रिय, खोजता...
क्या.. ढूंढने, आता..यहां मैं.. 
नित्य.., प्रिय...
बेखुदी में बैठकर, क्या सोचता।

आज भी, छोटा हूं मैं
इस गली में,
निक्कर पहन, कर घूमता,
उस हाल में.., प्रिय! 
बैठा हुआ, 
तंद्रिल-अटा* मैं
लजाता, आंखे छुपाए, 
उन आंख को हूं, देखता,
देखती थीं, जो.. मुझे, अपनेपने.. से 
प्यार में, फिर उन्हीं में डूबता..
मैं, बह.. रहा हूँ 
चाहता हूँ, और.. बहना...।

जय प्रकाश मिश्र
* विचि विथियों कल्लोल करता अर्थात लहरों सी बदलती, गतिशील.. गलियों में उधम मचाता
अटा * अर्थात देर से एक स्थिति में पड़ा हुआ



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