भीगी हुई रस पांगती मिष्टी सी थी।
मित्रों, बीता हुआ समय बाद में अच्छा ही लगता है और लोग चाहे जैसे मिले हों तटस्थ भाव से देखने पर अच्छे ही लगते है। इसी पर आज की लाइने आप आनंद लें।
तरल.. थी,
यह, सरल... थी,
बहती हुई....एक नदी.. थी।
जिंदगी मेरी प्रिये! एक कविता नवल थी।
सुंदर!
बहुत... थी,
सलोनी, एक मसल* थी
लोग.. भी,
जो.. जो.. मिले,
अनुपम.. प्रिये! प्रियतर... सभी थे..,!
सच कहूं ... मेरे लिए
आनंद की, यह.. लड़ी, थी...।
एक, कविता.. जिंदगी...,
बहती हुई.. प्रिय! नदी.. थी।
खंडहर, भी... थे,
कुछ.... किनारों पर..
पहने हुए...
प्रिय! नील गहवर, हृदय ऊपर
मिलते रहे, अप्रिय..! प्रिये..
पर, बगीची.. थी, प्रकृति पूरित स्नेह की।
एक, कविता.. जिंदगी...,
बहती हुई.. प्रिय! नदी.. थी।
किनारे.., कुछ दस्यु थे...
पर, कुछ भी हो, वे प्रिय.. लगे!
कुछ कलुष.. थे, कुछ कुटिल.. थे,
अपने लिए, सब.. चतुर थे,
कुछ अंधेरे सचमुच प्रिये थे..
घेर कर, मुझे बैठ कर,
प्रेम की डाली हिलकती,
लचकती, लुभाती, हिय मस्त.. थी।
एक कविता,
जिंदगी, .. प्रिये! बहती... नदी, थी।
यह, सच है प्रिय!
इस जिंदगी में..
मेरी.. तमन्ना, विकट थी!
पर, भीतर.. कहीं,
करुण, रस... भीगी हुई
रस पागती, मिष्टी भी, थी...।
एक, कविता.. जिंगी, बहती हुई....
प्रिय! नदी.. थी।
जय प्रकाश मिश्र
मसल* उदाहरण (अपने गांव घर के लिए)
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