उसने... खरीदे उजाले.., सारे.. प्रिये!

मित्रों, दीवाली आने वाली है, गरीब, अमीर यह सबका पर्व है। लोक, कैसे.. इसे मनाएगा इसी पर कुछ लाइने आप के लिए।

उसने... खरीदे 

उजाले.., 

सारे.. प्रिये!  इस दिवाली.. में, 

पैसे.. थे, उस पे..

इतना ही क्यों, चमकती हर धातुएं...

मणि और मुक्ता...

जो.. जो.. मिला, बिकता.. हुआ,

सब.. खरीदा, 

सारा.. जखीरा,  मुक्त.. मन से।

अंत क्या था! इन सभी का,

खुश हुआ! वह... 

और क्या..

बाहर.. से भीतर! 

प्रायश्चित भरा मन! प्रिये.. ले कर! 


मेरे लिए तो, अंधेरे... थे, 

पैसे.., नहीं.. थे,

पर मुफ्त थे, ये...

गलियों में मेरे.. शाम को, हर...

कोई कितना भी, ले.. ले..।


व्यापारी हैं, वो..! 

वो.... बेंच देते! इसे... भी..

अगरचे... 

कोई खरीदे, इन अंधेरों को...

तकनीक से..., कंट्रास्ट... में, 

उन, रौशनी... को, 

झिलमिलाहट.. में बदल दे...।


सोचता हूँ!  

प्रिये... 

रे.... 

तब क्या बचेगा... हम गरीबों के लिए।

ना उजाले, ना अंधेरे, हम कहां होंगे।


ये जगमगाहट.., 

झिलमिलाती... रौशनी, 

जो, खींचती... है

मन तेरा..., किसकी.. बनी है।

राज हैं, जाने न कितने...

छुपे इसमें...

शर्म के, बेहया...पन, के... प्रिये! 

अतिचार, अत्याचार, प्रिय अपचार के,

नेपथ्य.. में, सड़ते हुए...

कभी देखना..

अखबार में...कारनामे, इन्हीं के 

छपते... हुए।


वो.. उन्ज़ाले, महंगे हैं, बच्चों,

चुप रहो! 

देखो इन्हें तुम दूर से, और खुश रहो! 

दीवार का बस फासला...है

ज्यादा नहीं है,

मेहनत करो, ईमान में विश्वास रखो

पकड़ लोगे, उँजालो को,

एक दिन, तुम पकड़ लोगे। 


एक बुढ़िया, कराहती.. धीमे से बोली,

मेरे... बच्चों! 

तुम... 

अंधेरों... से, मत डरो...

तुम उजाले हो, आज ही निश्चय करो.. 

श्याम मेरा, तुम्हीं जैसा सांवरा था

उजालों से भर दिया जग, 

वह, सांवरा.. था.

उठाओ उन्हें, प्रेम.. से.. 

निज.. बाहुओं में, चूम लो! 

नायक बनाओ 

उन्हें फिर, और जग, यह.. जीत लो।


अंत क्या था! दीवाली का 

सभी.. खुश थे.।

बराबर.. थे, अभी दोनों.... 

दिन... कितने हुए, बाजार.. था, 

कुचलियों का अड्डा! प्रिये

वह बहुत गहरे गिर गया, 

मैं खुश रहा, 

वह क्लेश में अब है फंसा।

चमकतीं ये धातुएं, चमत्कृत चीजें यहां... 

बिकती हुई, ये.. खुशी, सारी...

धोख है! तुम बचे रहना, प्रिय.. यहां।

जय प्रकाश मिश्र

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