ऐ गांव की ताजी हवा एक गजल कह दे।

ऐ! गांव की ताजी हवा! 

एक गजल कह दे,

कान.. में, 

इन...

बहुत धीमे.., और धीमे...।


भेज दे, पुरूवा.. हवाएं.., 

घर पे.. मेरे...,

देख.. ना, 

मेहमान है, आया.. हुआ, 

एक.., बीच अपने! 


पहचान.. रे! 

भविष्य.. है यह!  

हम सभी का, बर्लिन... शहर से। 

उन.. पर्वतों के, ताल पर 

नचती.. हवाएं! 

किलकारियां भरती हुईं, कोई सदाएँ!

बादलों का, बदलियों संग

झुनकता, कोई रुनझुनी स्वर 

इधर कह दे। 


संगीत, भर...दे,

सरस कोई झिंगुरी.. सा पार्श्व में!  

जुगनुओं.. का, धूमिल... सही

प्रकाश.., कर.. दे..।

कुछ इस तरह, अंधेरों में, 

झिलमिलाहट, रौशनी की, 

आज भर दे।


पग दो

एक तिनका बह रहा था, 

नदी में, 

बैठा हुआ एक कीट उस पर

सोचता था, 

कल क्या करेगा

प्रात में, 

आगे भयानक! प्रपाती थी, 

गिर रही, पाषाण से

नीचे, बहुत.. 

अंजान उससे... 

क्या कहूं! हम मनुज सच

अलग है, कहां इससे।

जय प्रकाश मिश्र



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