एक अक्षर... मात्र "मैं" में, अटक... कर
मित्रों, जीवन का सच्चा आनंद स्वार्थ और मात्र अपने मैं के बाहर ही मिलता है। जब उस विराट से हम मिल एक हो जाते हैं इसी पर कुछ लाइने आप, पढ़.. आनंद लें।
बस..,
एक.. "मैं.." को
साथ.. लेकर, जिंदगी.... भर,
रह, गया.. मैं...
निकला.. नहीं, कभी...
एक.. "मैं.." को
साथ.. लेकर, जिंदगी.... भर,
रह, गया.. मैं...
निकला.. नहीं, कभी...
इससे... बाहर...!
कुछ इस तरह,
ऐ.. जिंदगी..! खो.. गया मैं।
ऐ.. जिंदगी..! खो.. गया मैं।
कितना..!
बड़ा.., आकाश.. था,
वनराजि.. थी,
संपदा..!
कितनी... विपुल! थी,
उन! सागरो... के, गर्भ... में
अकूत... थी,
सच! कहूँ, अपार... थी,
सच! कहूँ, अपार... थी,
विपुल.. थी, संभावना...,
मेरे... लिए, प्रिय! बांह खोले...,
मेरे... लिए, प्रिय! बांह खोले...,
पर...
एक अक्षर...
मात्र "मैं" में, ही, अटक... कर
एक अक्षर...
मात्र "मैं" में, ही, अटक... कर
संपूर्ण जीवन, रह.... गया, मैं..।
बस, एक 'मैं' को,
साथ ले,
ता-जिंदगी, प्रिय
रह... गया मैं।
कितनी.. व्यथा, विषाद.. कितना!
अपमान.. कितना...
एक..., "मैं" के..
लिए, प्रिय...
हो...,
साक्षी... तुम!
जिंदगी भर, घूंट.. कड़ुआ..
जिंदगी भर, घूंट.. कड़ुआ..
सरल दिखता..., किस.. तरह,
आह! बिन..ही., पी.., गया, मैं..।
क्योंकि...
एक... मैं.. से...,
क्योंकि...
एक... मैं.. से...,
मात्र, सट... कर,
जिंदगी.. भर, रह गया मैं।
खिड़की, खुली.. थी,
हवा.. थी,
सुरभित, सुगंधित.,
ताज़गी.. थी।
दौलतें.., प्रिय! खुदा.. की,
दौलतें.., प्रिय! खुदा.. की,
नियामतें... हजार थीं,
पर...
सोचता हूं आज!
तब उन बादलों में, देखता
सोचता हूं आज!
तब उन बादलों में, देखता
परियां.. हजार,
बेशुमार, रह गया मैं।
मरीचिका थी, मृग नहीं था..
किस तरह, मैं...
बालकों सा, एक "मैं" में...
मछलियों सा, फंस गया मैं।
सोचता हूं!
तोड़.. दूं, इस खोल.. को!
जो, मैं... है, मेरा...
बाहर निकल लूं!
जा.. मिलूं....
उन हवाओ... से
घर.. बादलों के,
फुंगियों पर लहर खाऊं।
घर.. बादलों के,
फुंगियों पर लहर खाऊं।
तरंगों पर, सागरों.. के, दौड़ता...
नदी के, पीहर.. मैं जाऊं।
क्या!
नहीं, सीमित! हूं... मैं..
चुप शांत बैठूं, खोल में इस,
तोड़ दूं!
आनंद के उस निरवयव
प्रिय झील में, मैं... कूद जाऊं।
अनुभूतियों को बांध कर
कुछ अक्षरों में,
आप सब को भेज पाऊं।
मित्र! सबको भेज पाऊं।
जय प्रकाश मिश्र
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