कुछ नहीं, कहना मुझे है, बस, तुम्हे है देखना

मैं, क्या करूंगा, वस्तुएं.., 
और...
साधन, संपदा.. 
भूलता.. हूं! रख.. इन्हें, प्रिय..
इसलिए, मैं.. 
वस्त्र बुनता, इन सभी से
देख कैसा! नित.. नया! 

और, तुमको.. भेजता हूं,
हर.. सुबह, 
जरूरत हो, पहन.. लेना, 
अन्यथा....
रखना नहीं, ये फूल.. हैं,
इन्हें बांट देना, मुफलिसो में, 
रोटियों... सम।

भाव: रोटी और फूल दोनों समय से प्रयोग न किए गए तो निष्प्रभ और बासी बेकार! ऐसे ही अपने गुण और अन्यान्य संपदा संपत्ति भी है, समय से इन्हें प्रयोग करें।

यह, सत्य.. है, मैं, सुस्त.. हूँ
पर, चाहता हूँ, कुछ... कहूं! 
तुम! बैठ जाओ, दम तो लो! 
इसी में मैं, सबसे..., खुश हूं! 

कुछ नहीं, कहना... है, 
मुझको...
बस, तुम्हे... है, देखना..
तुम! ठीक हो, स्वस्थ.. हो, 
प्रिय.., शांत... भी हो..
आश्वस्त, हो... लूं! 
इसके, आगे, कुछ नहीं, 
मुझे, चाहिए...
बेवजह, कुछ..., क्यों... कहूं! 

भाव: समस्त का प्रयोजन मात्र आपका स्वास्थ्य, आपकी शांति और प्रसन्नता ही है, अगर किसी पर यह है तो उसको जीने का मार्ग पता है। उसे उपदेश क्यों! 

तितलिका सा, बहुत.. सुंदर,
रंग.. पंखों पर, लिए, 
उड़ता था, मैं..,
बस...
कुछ दिन ही, पहले... ।

उन अधखिले.. खिलते.. हुए
सौरभ भरे, गुल गुलाबी...
रक्ताभ सुंदर.. 
प्रिय..! पुष्प पर, जब बैठता, मैं...,
पंख फैलाए हुए, सुख-पंखुरी पर।

क्या... दृश्य था, 
पर...
देख... अब,
सच! एक लाइन श्याम सी, 
सिकुड़ कर
मैं..., रह गया हूं! 
पंख सिमटाए हुए, 
उसी.. तितलिका... सम।

जिंदगी.. है, 
यह.. जिंदगी है,
देख इसको, गौर से, 
कुछ, कर... अभी से।

जय प्रकाश मिश्र




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