दिन हुए प्रिय, हरिन शावक..
मित्रों, आप सभी को पावन नवरात्रों के नवमी तिथि की आराध्या देवी मां सिद्धिदात्री की कृपा मिले च मेरी ओर से आप सभी को इस दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं।
खाता.. रहा,
पीता.. रहा, सोता.. रहा,
मैं...
सोचता यह,
और, क्या... है, जिंदगी..!
पर, दिन हुए ये, हरिन शावक..
उड़.., चुके..
अब..,
पक.. रही.. है जिंदगी।
चाहिए, कुछ.. और,
इसको..
इस... लिए,
उन.. रास्तों से, हट.. रही है, जिंदगी।
आ गया हूं, बहुत... नीचे,
जमीं.. पर,
उस पोल.. से, उस शिखर की
उड़ती.. हुई, उतनी.. ऊंचाई,
छोड़ कर,
अब, ग्रास.. पर,
नीचे... यहां, बेसिक्स.. पर,
मैं... खड़ा हूँ!
जिंदगी का, सच लिए!
नजदीक से,
नग्न.., भग्ना.. देखता हूँ प्रिय इसे।
खो.. गया था, कहीं.... बाहर,
इतने... दिन,
मरीचिका कोई, मखमली,
सुंदर.. अधिक थी,
धूप में इस जिंदगी की,
छांव, सी... थी
घनेरी... सुखकर तो थी
दुख़ तर,
न.., कम.. थी।
यह, भूल.. थी, मेरी
प्रिये?
क्या..! तूं बता..दे,
देखता हूं! फट गया है, पट मेरा,
पुराना भी हो गया है...
घिस गया है बाजुओं पर,
अब, आवरण.. ही, बच रहा।
क्या अर्थ.. था,
इस जिंदगी का, इस रास्ते.. का,
सोचता हूं!
कौन.. सा, वह सत्य गहरा
था... छुपा!
खोजकर..., उसे बोलता हूँ, तुम सुनो।
बस..
रास्ता यह
इसलिए था, खुद से मैं,
खुद... राह में इस,
मोड पर किसी, मिल.. सकूं..।
प्रकृति अपनी देखता,
आत्म का दर्शन कर सकूं!
दुश्वारियों के बीच में,
हार कर, अपनेपने की ताकतों से
दुनियां में इस..
कभी तो मैं, हे प्रिये!
अरे!
'उससे...' मिल सकूं।
विस्मय सही, अतिरेक ही, हिंसा अहिंसा
गरीबी में, दासता में
दर्शन तो उसका कर सकूं,
दर्शन तो उसका कर सकूं।
जो एक है, ना एक है, फैला पड़ा है हर कहीं।
अंदर मेरे, बाहर तेरे, इस सृष्टि भर में, हर कहीं।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment