एक् बुलबुला' ले... परेशाँ.. है. हर कोई!

मौन... से, 
सब... निकलता.. है
मौन... ही में, समा... जाता..
देख! फिर... भी, जहां.. में इस..
एक अपना..'बुलबुला' 
ले... परेशाँ.. 
है...
हर कोई! 

संकेतार्थ: हम सभी का जीवन बुलबुले सा सुंदर, आकर्षक तो है पर मौन से मौन या शून्य से शून्य तक की यात्रा ही है। हम इस जीवन रूपी बुलबुले के स्थायित्व, और समस्याओं को ले सारे जीवन दुखी हैं।

रात...दिन! 
इसे..
फूटने... से, बचाते हैं, 
चिंतित.. सभी है, दुखी.. हैं, 
पर देख न! 
चमकते इन बुलबुलों के रंग पर, 
मोहित.. सभी हैं।

अर्थ: जीवन सदा अनिश्चिति के झूले में ही रहता है, संसार सभी को छोड़ना है ही, फिर भी यह स्थाई होने के भ्रम में डाले रहता है।

देख! कैसे उड़.. रहा, यह हवाओं.. में 
फिजाओं में, विमानों में
लहर ले! रंगीन..!  
कैसा? 
तुम्हारा...! 
गमगीन... है क्या?  
तो...
छोड़.. दो.., 
बस विचारों को..
आगे बढ़ो, वह कुछ नहीं है.. 
मात्र भ्रम... है..
जिसको लिए, तुम.. दुखी हो... ।

अर्थ: जीवन आनंद के लिए है। फिर भी हम विचार या भावनाओं मात्र से भयभीत या दुखी रहते हैं। अतः वृत्ति के जन्म दाता विचारों से मुक्त होना सीखें।

वह..., 
कुछ नहीं था, नहीं.. है
ढोने के जैसा...
छोड़ दोगे, एक दिन! 
तुम यहीं...पर
मित्र!  सब कुछ
यह सत्य है! 
तो 
छोड़ दो, तुम.. अभी उसको,
जीवन जिओ, बच्चे के जैसा...
फ्रेश रहो, 
आनंद है यह जिंदगी...
प्रेम से इसको जिओ,
आनंद के झरने झरो! 

अर्थ: हम लोगों द्वारा अपने प्रति किए गए अपकार, दुष्टता या किसी भी बात को बच्चे की तरह भूलना और उन्हें सच्चे मन से क्षमा करना सीखें। आखिर उन बातों को छोड़ते तो हैं ही पर परेशान होके यह अच्छा नहीं।

आ... 
बैठ... मेरे पास
थोड़ा...  सुन तो, 
मेरी....
और क्या... है, 
जिंदगी! तेरी.. या मेरी..,
मेहमान.., ही तो 
इस धरा 
पर
चंद दिन की।

इस लिए तो कह रहा हूं! 
आ... मिलो! हे मित्र मेरे
खेल.. लें, हम
खेल कोई! 
बनाएं 
सुंदर घरौंदा, 
प्यार उसमें रख के, चल... दें।

सफर में, उस दूर के,
आए जहां से
प्रिये हम 
थे।
शेष क्या! अवशेष क्या?  
कुछ नहीं है, 
बहती हुई, जो.. बह चुकी, 
जो बहेगी, ये... 
जिंदगी! 

आओ.., थोड़ा.. विश्राम, कर लो
शांति के दामन को छू... लो
सच! 
दो.. पलों की, जिंदगी! 
यह दो पलों की जिंदगी! 

जय प्रकाश मिश्र







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