पूछ.. बैठी, प्रिया... एक दिन!
मित्रों, शब्द की भूल भुलैया में खोना भी एक आनंद है। वैसे भी हम जीवनपर्यंत इस संसार की भुलभुलैया में ही खोए हुए हैं। चालिए एक बार इस शब्द-कुंज में बिहरते हैं। आप पढ़ कर मगन हों यही इच्छा है।
पूछ.. बैठी, प्रिया... एक दिन!
यह, जिंदगी, क्या चीज है?
सत्य को छूती हुई यह
सत्य है..!
या..,
दिप-दिपाते...
सत्य से, यह दूर... है।
मैने कहा..
यह....
सत्य को छूती हुई
दिखती.. हुई, गौरवमयी...
एक.. खेल है, रे!
सत्य को छूती हुई
दिखती.. हुई, गौरवमयी...
एक.. खेल है, रे!
जिंदगी..
आनंद, ले... तूं,
बस, पी इसे,
संजीदगी से खेल इसको।
पर,
मान मेरी..
जिंदगी... की, दौड़ती..
इस रेस.. में
ना कोई भी, पास.. है,
और ना कोई ही, फेल.. रे!
हम... जुड़.. सकें, सद्भाव... से
कुछ कर सकें, बेहतर इसे...
बस और क्या है,
कुछ कर सकें, बेहतर इसे...
बस और क्या है,
जिंदगी..!
ये...
एक यवनिका.. उठती... हुई!
एक यवनिका गिरती हुई!
पियु..! यह...
जिंदगी, तेरी.. मेरी..।
इन इंद्रियों.. की, प्यास.. सी
जलती.. हुई, बुझती.. हुई,
प्रवंचना.. है,
प्रवंचना.. है,
आत्म
की,
अनात्म से जुड़ती.. हुई।
पिय..!
सच कहूं तो
प्रवंचना ही जिंदगी।
गति...,
कोई.. है,
आंतरिक, नचती.. हुई,
हर एक कण में, समय.. संग
रचती.. हुईं।
चादर कोई है, भावना.. की,
कल्पना.. के द्वार पर
चादर कोई है, भावना.. की,
कल्पना.. के द्वार पर
उड़ती.. हुई,
आकर्षण.. भी कुछ..
अपकर्षण... भी कुछ,
अपकर्षण... भी कुछ,
अपमान.. कुछ, अभिमान.. कुछ!
इससे.. जुड़े.. सामान.. कुछ!
बस समझ ले,
अवसान सबकुछ एक दिन!
अवसान सबकुछ एक दिन!
प्रिय यही तो यह जिंदगी !
प्रिय! और क्या है जिंदगी?
उन्नति चढ़ी..,
अवनति... उतरती...,
सभ्यता.. की, ...परिणति,
यह! शिव जटा में गिर.. रही
'काल' में पगती... हुई
भागीरथी बनती हुई..
प्रिय! तेरी मेरी जिंदगी।
क्या क्या कहूं!
कैसे कहूं!
यह रक्त... रंग, बे-रक्त.. कुछ!
आकृति.. मिटती हुई..
कभी आकृति बनती हुई
एक में मिलती हुई, दीप सी बुझती हुई
एक में मिलती हुई, दीप सी बुझती हुई
प्रिय! जिंदगी तेरी... मेरी।
यह विश्व क्या है,
एक तृष्णा..!
प्यास.. बन उगती हुई,
प्यास बन बुझती हुई, ठगती हुई।
हर एक को, जिंदगी बनती हुई।
बुझ गई तो राख..
फिर.. से
बन.. जिंदगी,
उठती... हुई, जिंदगी... गिरती हुई,
रील एक चलती हुई।
प्रश्न तेरा,
सत्य... पर था..
सत्य.. को किसने बनाया?
जो कुछ जहां.. है, और जैसा..
सत्य... है
प्रिय! स्वयं यह बनता बिगड़ता..।
प्राप्त ही सबने किया है,
प्राप्त ही सबने किया है,
यह....
निरपेक्ष है, चैतन्य है, आनंद है
सत्य.. तो
निरपेक्ष है, चैतन्य है, आनंद है
सत्य.. तो
वह, एक... है,
खोल दे जो..., दृष्टि.. सबकी,
वह.., चैतन्य.. ही, आनंद.. है..।
चैतन्य क्या है?
अरे, यह है...
वास्तविकता.., सत्य.. की!
वास्तविकता.., सत्य.. की!
खिल.. उठा हो!
आत्मा का कमल.. जब प्रिय!
दिखता.. उसे है,
सब अलग
वह.. नाचता, बिन बात.. का...
झरता.. सतत, सुख... गात सा,
निर्झर..., अमल.. रे!
चेतना का नृत्य.. अद्भुत,
अपने.. पने में
चैतन्य.. है,
पर विरल.. है रे! विरल.. है यह।
जय प्रकाश मिश्र
सद्यः स्फुरन् प्राप्त पंक्तियां
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