पेट.. है यह! आग... इसकी, सबसे... ऊपर!
मित्रों, जीवन की मूलभूत जरूरतें हर जीवित को मिलें यह सरकार का काम तो है ही, पर अपने आस पास, घर के कामगार या नौकर के प्रति इसका ध्यान हमें भी रखना चाहिए, ज्यादा नहीं मानवता के तराजू पर तौल भर बस। इसी पर कुछ लाइने आप के आनंद हेतु प्रेषित हैं।
कला, संस्कृति, शब्द सुंदर..
रंग, मोती, रजत, मणि कण
व्यर्थ... हैं, सब
पेट.. के,
तिनके... के आगे.. कुछ नहीं
बेकार... हैं सब।
सच... कह रहा हूँ!
देखा... है, मैने!
सुंदर रंगी.., सुंदर... बनी..
वह...,
पूरियों.... की आकृति!
अनन्यतम...., अनुपम.. परम्!
रखी.. हुई थी,
रखी, रही....,
बासी... बची, सूखी... तपी,
उच्छिष्ट..., सी.. ही,
एक टुकड़ा..., चींटी...
चढ़ी....,
रोटी... के आगे।
पेट... है, यह..!
चाहिए, इसको... प्रिये!
कुछ... अन्न!
बस, यह... भर सके,
जीवन तो आगे चल सके...;
शेष, उसके बाद.. है, सब...।
जल... रहा था,
रोम... जब..
वर्षों... प्रिये! उस आग.. में
महल... में, बैठा... था
नीरो...
फ्लूट... ले,
बजाता..., बहुत.. सुंदर
राग... वो, अभिराम... अनुपम...
राजा... था, वह..,
प्रिय..!
रोम..... का
कला.. का, वह.. पारखी...
प्रेमी..., गजब.. था..।
पर... क्या हुआ?
धक्का मिला, नीचे गिरा, गद्दी गई, मिट्टी मिला।
इसलिए तो कह रहा हूँ
पेट.. है, यह...!
आग... इसकी, सबसे... ऊपर!
जल रही है, हर जगह!
हर आदमी में,
बुझती रहे यह, कम से कम!
जल ना उठे..
यह जला देगी, हरा सब कुछ, दीख़ता है
जो जहां कुछ! बिना सोचे!
बिना समझे.., साथ अपने।
इसलिए मैं, कह रहा हूँ!
मिल... सभी, थोड़ा ध्यान रखो!
गरीबों का,
अनाश्रितों का, अपाहिजों का
बेसहारा नागरिक का,
वृद्ध का, बीमार का, बिचारे इन
बेसहारा बालकों का, औरतों का...।
और तुमसे कुछ नहीं मुझे चाहिए।
अपने बगल... के,
पेट का बस... ध्यान रखो।
जय प्रकाश मिश्र
कागज से सुंदर, मूर्तियों
Comments
Post a Comment