डाली लचक के रह गई,
मित्रों, जीवन में मिठास, प्रेम ही ला सकता है। इसी पर एक अति संक्षिप्त शब्द-रचना आपके आनंद हेतु प्रस्तुत है।
एक शुक और सारिका..., बैठे.. हुए थे,
साख.. पर, सूखी... हुई,
सुंदर.., कभी.. थी,
पीले.. खिले थे
पुष्प...
इसकी डालियों पर, तब.. हरी... थी।
प्रेम क्या है? प्रिय.. बताओ!
सारिका, धीमे.. से बोली,
शुक, चुप... रहा,
डाल, लचकी..
खुश.. हुई,
देखती 'शुक् शुकी' को इस.. स्थिति में..
स्नेह से, आहें भरी...
थोड़ा रुकी, हँसने... लगी...
इशारों.. में प्रिय, वो.. बोली..
प्रेम ही....
१. आनंद... है,
२. खिलता.. हुआ, कोई पुष्प.. यह,
३. सूरज निकलता, प्रात.. का
४. कलियों का दर्शन,
एक माली.. जैसे करता,
हरष... उठता..
प्रेम है
५. बिना मतलब, एक बच्चा
हंस... रहा
देख कर जो दिल में होता,
प्रेम है,
६. संत की आंखों से झरता अनवरत
वह प्रेम है, और क्या है...
प्रेम..!
७. बाउरि! खोज... है?
गोइयां की सुंदर.. हुलास भर कर!
८. उल्लास में, जिंदगी की नाव... संग संग
मिल के खेता... सुख दुखों में साथ देता
यह योग भी, शुकी!
प्रेम है,
अंदर, ये... होता,
हर किसी के,
मुश्किल... से खिलता,
मुश्किल... से मिलता।
दुर्लभ.. नहीं, यह.. सुलभ है,
प्रेम, सबमें.. सदा.. रहता।
चुप हुई, डाली... वो,
सूखी...
बोलकर..!
चू... पड़े, दो अश्रु... बिंदू,
नेत्र.. से झर...!
शुक सारिका..., बैठे रहे,
सुनते.. रहे
फिर बांध..., कक्कन उड़ चले,
डाली, लचकती रह गई,
प्रेम के उस भार से, वह.. दब गई...।
जय प्रकाश मिश्र
आपको कैसी लगी ये लाइने जरूर बताएं।
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