काया कहां है? मित्र मेरी...
मित्रों, हम संसार में चाहे जो सोचें, और अपना कैसा भी पाला बनाएं पर हम हर वक्त अकेले ही हैं और हमारे साथ केवल कोई एक सदा बना रहता है। इसी पर एक छोटी सी तरंगिनि आपके लिए। पढ़ें.. और, आनंद.. लें।
पिट गई, कविता ये मेरी
काया कहां है, मित्र मेरी
फिर...
एक दिन मैं पूछ बैठा!
चुप! उसी.. से
कौन.. है तूं!
मित्र.. मेरा.., शत्रु.. मेरा,
आ.. घेरता, एकांत.. में,
आ.. घेरता, एकांत.. में,
मुझे, इस.. तरह से।
खींच कर!
आगोश... में ले!
एक होकर.. बैठता है..
इस तरह तूं सट.. के, मुझसे..!
अवसाद... है!
भावना... कोई! हठीली...?
किसी.. कर्म का क्लिष्ट.. सा,
प्रसाद.. है, तूं!
कौन.. है?
तूं!
कुछ... तो, बता ।
वो...
चुप... रहा..
मुझे, देखता.. , घूरता..!
निशब्द..., प्रिय! मैं क्या.. कहूँ!
आंख नीची.., विनत होकर,
दुम.. हिलाता...पास.. आया,
पालतू किसी श्वान.. सा
निकट.. बैठा!
आश्वस्त हो...
कहने लगा.. मैं कौन हूँ!
मुझे, ना... पता...!
काया.. कहां है? मित्र मेरी...
छाया... कहां है? मित्र मेरी...
मैं क्या.. कहूं! कैसे तुम्हे दूं..
मुश्किल.. में हूँ! परिचय मेरा।
जब, देखता.. हूँ,
मित्र, कोई..!
अपने.. जैसा, खुद.. में, खोया....
हारता...,
दुनियां से, इस...!
मैं, आ... गले, उसको लगाता..
सबसे.. पहले!
खड़ा होता, साथ... उसके..।
अकेला..
उसे.... देख कर,
मैं... दुखी.... होता!
बात.. करता, मनों.. में,
छुप.., चुप.. अकेले... ! संग उसके
बैठ कर, सांत्वना के, शब्द... कहता।
मैं,
तुझी में
एक.. साथी..
जन्म से ले मृत्यु तक
सदा..तेरे साथ.. रहता!
तूं.. पूछता है, कौन... हूँ! मैं...?
तो..., सुनो..,
मैं, आत्म... तेरा, आत्म... तेरा।
डर.. नहीं, आ मिल.. मुझे...
मैं... मित्र तेरा!
तूं.... मित्र मेंरा।
जय प्रकाश मिश्र
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