कुछ.. हो रहा है, गगन.. में,

मित्रों, बारिश के दिन हैं, भावनाएं उछलती ही हैं। ऊपर अनंत गहराइयों में भी प्रेम का ही राज्य है। इसी पर बहुत कम लाइने आपके मनोरंजन के लिए प्रेषित हैं।

देखो!  

वहां... प्रिय! 

गगन.. में, कुछ.. हो रहा है 

खुश.. है कोई! 

मिलन उसका, प्रियतमा से हो रहा है। 

इसलिए! क्या यह मधुर रस! 

जमीं पर, इस.. 

चू.. रहा 

है।

मधुर है, 

शीतल अनोखा, शुद्ध है, 

ध्वनि टपकने की, 

प्रिय!  मेरा उर... सुन रहा है।

भा रही है, शमां यह...

बज रही है सारंगी.. सुंदर!  मधुर! 

पेड़.. की इन 

पत्तियों.. 

पर

मन मेरा, इन सभी के संग खिल.. रहा है।


छींट.. एक, सुंदर सलोनी छप रही है...

छप छपाछप हृदय के प्रिय!  

पटल.. 

पर

तप, ही क्यों 

आतप प्रिये! मधुमास जैसा लग रहा है।

दूर कैसे हो रहा, संताप.. प्रिय! 

मधुलिका.. कैसे, मदिर!  

यह, छा रही 

है,

संगीत..

हल्का तरंगों में, उठ रहा, लय बांध कर! 

लयबद्ध होकर, प्राण मेरे

मिल रहा है।

कुछ.. हो रहा है, गगन.. में, कुछ.. हो रहा है।

खुश.. है कोई! 

मिलन उसका, प्रियतमा से हो रहा है। 

जय प्रकाश मिश्र

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