घर, नाही... ननदी के, भैया.. री दैया!

मित्रों, गांव में हमारी, बहने और मातृ शक्ति अपने स्वजन और बच्चों के साथ आर्थिक समस्या के चलते आज भी अपने 'कमाऊ प्रिय' से दूर अकेले ही रहती हैं। इस बारिश में लगौना की कमी, हर ओर सीलन और बाढ़ से भी उन्हें निपटना पड़ता है। उन वीर ललनाओं को समर्पित कुछ लाइने। आप पढ़ें और आनंद लें।

टुपुर.. टुपुर.. 

चुए..., 

हमरी.. मड़इया.. 

कोऊ... नाहि,  मड़ई छवइया.. 

री... मईया! 


कारी... बदरिया, कइस 

घिरि.. आईलि.. 

भईल... अँधिंयार...  दुपहरिया...

री... मईया!  

टुपुर.. टुपुर.., चुए..., हमरी.. मड़इया..।

कोउ... नाहिं, मड़ई छवइया.. री... दईया! 


टुप टुप बुनियां.. 

परलि...,  सारी... रतियां,

बरसलि... 

टुटि.. टुटि..., बाबू रे!  

बदरिया...!  

भरि गैलें सगरो दुआर, मोरि.. मईया,

टुपुर.. टुपुर.., चुए..., हमरी.. मड़इया..।

कोउ... नाहिं, मड़ई छवइया.. री... दईया! 


बदरा..!  गरजै, घहर... घहरावै... 

चमकैइ  टेढ़,  बिजुरि.. 

डरवावै... 

डरपटत..  जियरा 

हमार... मोरि... मईया...।

घर, नाही... ननदी के, भैया.. री दैया! 

टुपुर.. टुपुर.., चुए..., हमरी.. मड़इया..।

कोउ... नाहिं, मड़ई छवइया.. री... दईया! 


सासु.. मोरी भीजै.., ससुर मोर.., भीजैं...

देवरा कै भीजै,  कितबिया.. 

री!  दईया! 

छोट छोट बचवा.. कहां लई जाऊं! 

ई बरखा के मारि, 

जियतारि!  मोरी.. मईया! 

टुपुर.. टुपुर.., चुए..., हमरी.. मड़इया..।

कोउ... नाहिं, मड़ई छवइया.. री... दईया!


पास पड़ोस, 

ऊंचास.. सब, बाड़ेय.., 

उन्ह... बरखा लगे.... ले, 

गुरछारि...,  मोरि.. मईया।

टुपुर टुपुर चुए हमरी मड़इया.. 

कोऊ नाहि मड़ई छवइया, री दईया! 

दूर बाड़ें... ननदी के, भैया.. री दैया! 

घर नाहीं  ......  के भैया री!  .....। 

जय प्रकाश मिश्र

(प्रेरणा: यादों में बसी श्री शशिबिंदु राम त्रिपाठी, वर्ष १९८१ की एक ऐसी ही रचना )

 

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