भरोसा... कोई नहीं है
मित्रों, सभी को एक दिन एक लंबे सफर के लिए नितांत अकेले निकलना ही होता है। उस समय जल्दी बाजी न मचे। न बाहर और न ही भीतर हम जरूर चाहेंगे। इसी पर कुछ लाइने आपके आनंद में प्रस्तुत हैं।
अति-स्लीक सा,
'शैषे' बना लूं, एक कोई,
बहुत ही संक्षिप्त, मैं...,
यह, सोचता... हूं!
बहुत दिन से।
एक दिन तो अंत होगा
जिंदगी का,
तब... के लिए
जो... जरूरी हो,
उसे... पास रख लूं!
खोजकर, मैं जोड़कर
सहेजकर, सुखपूर्वक
नितांत
अपने ही लिए... !
बिछड़ते
संसार.... से
अंतिम... पलों में
क्या.. करूंगा ?
क्या नाम लूंगा 'राम' का
मंत्र कोई, मै पढूंगा !
आत्म में स्थिर रहूंगा
किस तरह!
भावना... किसकी करूंगा!
जगत मिथ्या सोचता,
क्या पग धरूंगा?
निर्वाण... को मैं..
और गहरे.... समझ कर
ध्यान में उसको रखूंगा!
या
पावक, पवन,
आकाश, धरती.. से
विलग मैं, चेतना हूँ,
आत्मा हूँ,
आनंद के संग,
सत्य के उस रथ चढूंगा।
आराम... से,
अभी समय... है
कुछ शेष...,
उस अंतिम सफर में।
यह, मानना है, मात्र.... मेरा!
भरोसा... कोई नहीं है
काल.... का,
किस समय, ऊंट यह
किस करवट... रहेगा।
इस लिए मैं चाहता हूँ
अति-स्लीक सा,
'शैषे' बना लूं, एक कोई,
बहुत ही संक्षिप्त, में...,
अंतिम सफर का।
जय प्रकाश मिश्र
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