मातृ नवमी पर विशेष: देवाधिदेव महादेव

अगर आप उन तल विहीन, असूझ, अबूझ व अंतहीन तमस्र की अंतिम गहराइयों में उतरने की इच्छा रखते हो तो हम आपको सचमुच उस अनंत अरूप गह्वर का साक्षात्कार भी कराएंगे। जहां सबकुछ अपने अस्तित्व मात्र में ही स्थित है। रूप, गुण, नाम, कर्म, संस्कार, पूर्व, पश्चात, आदि, अंत से विहीन एक  'सत्य मात्र', शांत, शाश्वत, चेतना से परे, भय बिहीन, परिणाम विहीन, केवल अस्तित्ववान तो आइए पग धरें। आप उन तक पहुंचो जो सम्पूर्ण विनाश के बाद भी अक्षत स्थित रहता है। वही तो अपने बाबा,  महादेव बाबा हैं।

एक.. 
शिवाला.. है 
परम.. सुंदर, अप्रतिम! 
आनंद प्रांगण… सुदीर्घ.. विस्तृत… 
सोचते..हों, जहां.. तक, 
सौंदर्य…! प्रिय…! 
हर.., ’सोच’.. इसमें, समाहित।

चहकतीं.. 
चिड़ियां.. यहां.., नवपुष्प.. सी, 
रंग.. भर भर, 
फ़ुदकतीं.. 
दीखती.. हैं, सुरसिका.. 
चंचल.. अधिक। 

कूकती…हैं, 
कूदतीं… हैं, इस डाल से 
उस डाल ऊपर! 
डोलती.. हैं पवन सी।
पत्तियों के बीच में… 
छांव है, 
अति घनेरी, शीतल समादृत।

वनराजि.. है! विस्तीर्ण.. फैली..
दूर.. तक, प्रशांति.... है,  
शांत है 
स्थान.. यह, 
समाधि है, चिदवास.. है।

सांवली… 
नभ.. 
नीलिमा का 
एक आंगन…! 
शीर्ष.. पर, लटका.. हुआ 
ऊपर से नीचे, झांकता.. 
प्रिय! 
सुमन हों 
लटके... हुए,
खिल.. खिला.., हंसते.. हुए
मुझे तो, ऐसा.. लगा।

निकट आते 
बादरा.., 
छुल.., बदरियों… संग! 
टपकते हैं, 
शीतल..., तरल हो, 
मृदुल… रस, 
आनंद में भर डूबता है, 
मेरा मन! 
फिर यहीं, फिर फिर यहीं।

प्रिय! 
देखता हूं, एक आभा! 
दीप्तिमय..! परम.. अनुपम!  
जिसे, ढक रहा है, चंपई 
सांवला.. तन,
रस.. प्रवण हैं, भुजाएं 
प्रलंबी…, 
क्षिति.. से क्षितिज.., 
आकाश… तक फैली हुई..
व्यापती.. हैं, प्रसरती.. हैं, 
क्षण.. अनुक्षण…
मेघ.. सम! 
इंद्रधनुषी रंग, प्रिय! सुंदर लिए, 
इन दिशाओं को
अभिराम... 
लयमय.. घेरता है 
विचित्रतम...।

धुल गई, वनराजि खिल कर 
खेलती.. है
बूंद संग.., 
थक गई है, झुक.. गई है
रात भर, यह विहंसती
रस.. सरस.. ज्यों
प्रिय..! प्रिया के संग।
 
बसेरा.. अनुपम है ये 
उन शक्ति का…
उन देवता… का, 
आनंद हैं जो...
सुंदर… हैं, जो.. भोले हैं, जो..
अवधूत.. हैं, 
प्रिय..! आदि हैं, 
जननी जनक इस विश्व के, 
शिवशंभु भोले।
पार्वती के नाथ, ’बाबा’ प्रिय.. हैं मोरे।

सुंदर हैं कितने, वस्त्र.. इनके..
मृगार्जन.. कोमल मुलायम
गलमाल.. गुंथित.. 
गुलाबी 
कलि-पुष्प निर्मित! अधखिले! 
पांव तक.. है 
लटकते…
भाल… कैसा? उन्न..तम !  
रूप का सागर! 
लहरता…,
नेत्र कैसे मृदुल- माधुर, 
चंद्रमा है… सुधा.. झरता। 

झर.. रही हैं, झनन.. करती, 
निर्झरी....
रस माधुरी प्रिय! बांटती, 
भागीरथी..
देख..! कैसे..! 

अंगे.. भुजंगा, फड़कते, 
फुफकार करते, 
डराते क्या.., पूछता हूं? 
गले की यह 
नीलिमा...
प्रिय! ..श्वेत, चंपक 
सहज.. तन में
अटकी हुई यह कालकूटी...
कालस्वामी.. कंठ में..
कैसी लगी।

एक मंदिर.. 
शिव... का इनमें
सबसे, अलग... है, झलकता।
मूर्ति… इसमें, है, नहीं, 
शिवलिंग केवल.., दीखता।

घंटियां… , 
भी बज. रही हैं, 
बाहर.. कहीं, थोड़ी… दूर पर..
भीतर यहां पर, शांति… है,
कुछ अलग सी ही, कांति.. है।
जगह, यह 
शीतल.. बहुत है
हर तरह, विश्रांति.. है।
प्रकाश, मद्धिम... जल रहा है
द्वार.. केवल, एक है,
झरोखे, बिल्कुल नहीं है...
झरोखे सा, 
बहुत छोटा, द्वार केवल एक है।

शीर्ष का 
अवनत ये तल!  
चहुंओर से है घेरता!  
भेजता… नीचे धरातल, 
पृष्ठ पर, 
शिवलिंग पर,
हर एक क्षण..., हर एक पल... 
हर.. किरण को, स्पंद को, 
लहर को, आवाज को, 
क्रमबद्ध कर कर
शिव के ऊपर, 
मेरे बाबा के ऊपर! 
देखता हूं! बैठकर, 
अदभुत बना है! शिवाला, 
अद्भुत बना है।

सोचता हूं
कितनी व्यथाएं!  
कितनी.. कथाएं, समस्याएं! 
पीड़... मन की, 
गुफ्तगू.. जो टीसती.. है 
रात दिन..! 
गुप्त.. है, 
अपने सनम.. की, 
दूसरों की, निजी भी,
यह....
सुन चुका है, 
आस देकर भेजता है।

शिव हैं ये, 
प्रीत इनकी सभी के प्रति, 
एक.. जैसी...,
कोई नहीं बड़का.. यहां, 
छुटका.. यहां..
भिखारी सब…, एक जैसे।

आते यहां, पाते यहां
विश्वास हैं ये, 
खुद खड़ी श्रद्धा यह पर 
देख कैसे!  घेर.. इनको! 

एक क्षण को 
अलग होतीं ही नहीं हैं,
मातृ.. वह, 
हम सभी.. की 
आदि.. जननी, पार्वती.. वह! 
क्रमशः आगे..

जय प्रकाश मिश्र


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