बूड़ा बंश कबीर का, उपजा पूत 'कमाल'
बूड़ा बंश कबीर का, उपजा पूत 'कमाल'
बुझ.... रहा,
दीया,
कोई... है, लपलपाता..!
जिस तरह....
बस...,
उस तरह...
बुझने.. के पहले....,
उद्गार... भरता, शख्स यह!
कर... रहा,
सब..!
बिना सोचे, बिना... समझे...
चाहना है, मात्र.. इसकी...
विप्लव मचा दे,
भेंट चाहे जो.... चढ़े!
देश पीछे खिसक ले..
तो खिसक ले,
यह,... बस,
स्वार्थ में, सत्ता... हिला दे।
सुर्निनिवाचित, निर्विवादित
व्यवस्था को जड़ों... से,
पैमाल कर दे।
क्या... करे, 'वह'..!
जानता.. अब!
अंत.. है!
मार..
दे!
निज, 'विरोधी' को,
अन्यथा..., यह 'खुद' मरे..!
रास्ता कोई नहीं है,
शेष... अब, इसके लिए...!
और.. क्या? है
जद्दोजहद...
यह..!
रोज... की,
बेवजह...
जो मर चुकीं... है सालों पहले,
शांति.. से,
सपनों में फिर, अपने नहीं...
मां को 'उस' जिंदा करे?
बच्चे... में, उसके..।
हित साधने को मात्र अपना!
मित्रों मेरे,
बीतते इस हिंदुओं के
पितृ-मातृ पक्ष, के ही..., बीच में।
देखा.. नहीं,
पूजा... नहीं, जिस पून्या... को,
आज तक पूछा नहीं
बात 'वह' उनकी... करे...।
अपमान है यह,
हम हिंदुओं का, हर.. तरह से।
इसलिए तो कह रहा हूं
पग दो:
रूप...! यह,
पार्थिव.... नहीं है!
प्राण.. गतिमय,
ऊर्जा... है।
मुखर होती,
डाली लगे उस पुष्प पर..
जो, टूटते... ही,
कुम्हलता है,
छोड़ कर प्रिय! प्राण अपना
सौंदर्य अपना, हारता है
उसी क्षण, से सतत क्रमशः...।
प्राण... है वह!
जो स्निग्ध है, नवल है,
सौंदर्य बन कर, दीख़ता.. है।
क्या! लाश का है रूप सुंदर!
रख सकोगे?
कमरे के भीतर! एक दिन!
इसलिए तो कह रहा हूँ...
प्राण... है,
सौंदर्य.. सारा, प्राण ही है रूप सुंदर।
प्राण से कुछ नहीं बेहतर!
प्राण से कुछ नहीं बेहतर!
जय प्रकाश मिश्र
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