एक छींटा, प्रेम का, इस उमस में

भाव: हर किसी को अपना रोल माडल, निसर्ग मित्र मिलता जरूर है बेशक क्षण मात्र के ही लिए हो। उसे देखकर आप अंदर से अपूर्व खिल जाते हैं। वह क्या है, जो एक पल में आप को बंधन बांध, जीवन क्या, मृत्यु तक के लिए अपना बना लेता है। वास्तव में वहीं आपका कॉम्प्लीमेंट, पूरक होता है। आप उसे देखे नहीं कि, अंधे कुएं में  गिरे। आज इसी पर कुछ लाइने आपके आनंद हेतु।

तुम..!  वही...,  हो.., 

हे...

प्रिय... मेरे,

जो... मैं.. नहीं ! 

और, तुमसे.. क्या कहूं! 

तुम देख.. लो, आंखों... में मेरे..

गहराई.. नहीं! 

निष्कलुश यह, सौम्यता, मुझमें.. नहीं।

भाव: आप अपने पूरक से चुंबक की तरह एक क्षण में आकर्षित होते हैं। वह वह होता है जो गुण-धर्म, तत्व आप में नहीं लेकिन प्यास अंदर उसकी दबी रह गई है।

क्यों... खींचती हो, इस तरह..

मैं भूलता हूं, रास्ता..

वो... क्या है?  तुममें!  सोचता हूं! 

सजगता... यह, दृष्टि.. की, 

लोलता... यह,

अधर की, नयन की, चिंबुक की

मुझमें नहीं, मुझमें नहीं।

भाव: स्थिर, गहरी! दृष्टि, बिना विक्षोभ की, निर्मल आंखे, ठहरा हुआ विश्रमित चित पल भर में आपको रोक लेगा। क्योंकि आप में वह नही है आप भाग दौड़ से ग्रसित हैं।

हटती... नहीं, तुम..! सामने से, 

एक पल! 

पर, सामने! तुम..

देखता.. हूं,  हो... नहीं, 

मैं...,   क्या.. करूं! 

क्या, अलग.. है, अन्य.. तुझमें, 

इस जहां.. से, 

ढूंढता.. हूं, 

बुलावा...? कोई मौन है!   बिल्कुल नहीं! 

दुत्कार.. है, वो... भी नहीं,   

प्यार... है..,  संभव नहीं।

कुछ कमी... 

मुझमें, ऐसी... है

तुझ में, ही... है, वह.. बस... रही,  

लेकिन वो है, क्या? 

नम्रता, शालीनता, दानी हो तुम! 

इस मुख... कमल.. की. 

एक.. क्षण.. की,

हर किसी, रूखे हृदय की, 

सूखे हृदय की, रस.. तृप्ति हो.. तुम! 

दृश्य हो, लौकिक नहीं।

अलौकिक! हो.. तुम! 

भाव: जब कोई सामने न रह कर भी सामने से हटता ही नहीं तो वह आपका संपूरक ही है। यद्यपि उसने आपको कोई आमंत्रण, संदेश, स्वीकार्यता प्रदर्शित नहीं की फिर भी आप बंध गए और जीवन के अंत तक बंधे रहते हैं। ये रेशे समय के साथ पुराने नहीं नव्य होते जाते है। यह किसी की शालीनता, नम्रता, स्थिरता, निसर्ग सौंदर्य कुछ भी हो सकता है। जिसकी आपको सख्त जरूरत निश्चित होती है। आपके जीवन में उसका अभाव अवश्य रहा होगा। यही आकर्षण का कारण है।

आईन... हो! 

परा-लौकिक.., सृष्टि ..की, 

क्या हो तुम! 

क्या कहूं? 

तुम जो भी हो, ललकते, उछलते, 

शुष्क मन की

सांत्वना!  परिकल्पना की कल्पना तुम! 


एक.. झरना, फूटता.. हो, फोड़ता...

खुशियों.. का मेरे

पाताल.. से

वही... मीठा, परम.. निर्मल, 

जल.., हो... तुम ।


एक छींटा, प्रेम का, इस उमस में

इस, जुलाई.. में

बरसती.. बदली हो तुम! 

बहुत ऊंचे.. आकाश में, अब दीखती 

एक तारिका हो

स्वर्ग की कोई अप्सरा! दिखती हो तुम।

जय प्रकाश मिश्र

 





Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!