आप को रक्षा बंधन पर्व की बधाई।
सभी मित्रों, सुहृदजन, इष्टजन, निजजन, आदरणीयजन च प्रियजन को श्रावणी पूर्णिमा और रक्षाबंधन की सादर शुभकामनाएं।
पृष्ठभूमि: हम उस पुरातन संस्कृति वाले देश भारत के नागरिक भारत-वंश के भारतवासी हैं, जहां अनेक धर्म और संस्कृति ने काल क्रम में अपने स्वरूप को तिरोहित किया, आत्मसात करते हुए इसी में मिल गए। फिर भी कुछ लोग अभी अलग पूजा पद्धति अपनाते हैं। वह लोग भी इस सनातन धर्म की पूजा कर्म को देख अभिभूत हो जाते हैं। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए।
वह, उधर...,
उस... पार था..,
इस पार..., उसको
दीखता..., कुछ भी नहीं था,
पर, देख कर, वह.. प्रज्वलित...
प्रललित...,
अद्भुत.. मनोहर,
नीलिमा.. ले जल रही
प्रज्वल्यमाना.. अग्नि.. को
सुंदर, सुवासित
हव्य..., के संग, हवन... को...,
हो रहे... उस यज्ञ को...
निकलते...
पावन पवित्रा...
वैरोचनीया धूम्र... को...
सुवर्ण केशी, नीलिमामय अग्नि को
देखता था, सोचता... था!
कुछ तो है!
इस पार! अद्भुत, इनकी तरफ से...
जो... उसे,
क्षण-अनुक्षण, ओर अपनी,
खींचता था, लुभाता था, साथ अपने।
चकित था! वह
देखता..
रंग बिरंगा कार्यक्रम...सब,
इधर का..
आश्चर्य-मिश्रित... भाव से
आत्ममय हो..
आत्म.. में ही, संग्रथित.. हो
आत्म ही में बंध गया था।
कुछ सुना,
कुछ जानता था, पूजा है यह.....!
"श्रीसत्य-नारायण" देव जी की
सुन चुका था, पर भ्रमित था!
इस नाम से, वह
श्रीराम, शिव, हनुमान, दुर्गा आदि से
बिल्कुल अलग, इस तरह के
"देवता" से आज तक,
परिचित नहीं था।
किस भाव से, किस प्रेम से,
बैठते हैं, साथ सारे...
पेड़ की किसी... छांव में
पीपल.. हो कोई, बरगद.. हो कोई,
नीम हो
प्राथमिकता, प्रथम... है,
यदि नहीं तो किनारा हो,
पयस्विनी.. बहती नदी का
या तीर्थ हो,
देवमंदिर पास में निर्मित हो कोई !
कुछ नहीं तो
घर ही अपना, तुलसी लगाआंगन कोई हो,
गोबर पुता, बस गाय का,
निर्मल भवन हो।
किस तरह ये
लाल पिला वस्त्र रखकर... स्नेह से
स्वच्छ.. कदली पत्र, रख कर, प्रेम.. से
उच्चस्थ.. थोड़ा, देवता को रख.. रहे हैं...
एक मृत्तिका... पात्र.. को,
कलश.. ये सब कह.. रहे हैं।
भर.. रहे गंगाजली.. सब साथ मिलजुल..
आम्र की पल्लव लगाकर, पुष्प सज्जित..,
तंदुल उसी पर रख रहे हैं,
पानी भरा, बजता हुआ, सूखा बरन*
चोटी लगा, एक नारियल,
सबसे ऊपर...
चावलों पर रख रहे हैं।
सजा है यह कलश कैसा !
गुँथा है !
गाय गोबर, साथ इसके, रज्जुओं सा
लगा है
रोली लगी है, चंदन लगा है,
पुष्प की माला चढ़ी है कंठ पर..
आह! कैसा फब रहा है।
सुंदर सुगंधित द्रव्य, लेकर
घृत पुराना, गऊ का ले...
एक दीपक पास में ही जल रहा है।
पास में है एक थाली, रंग भरी सी..
फूल से,
महमह महकती...
कर्पूर से...
नव दूर्वा का अंकुरित, नवगुच्छ बंधित
पान पत्ता डंठलों संग,
पुंगी फली, यह सुपारी, रखी हुई है,
चावल, दही, हल्दी, के संग।
हरी हरी, पल्लव लगी,
मूंज की रस्सी बंधी,
स्थान पर
बिठाते हैं पूज्य को यह,
गोबर से निर्मित, आदि पूजित..
श्रीगौरी-गणेश को हाथ से ही बनाकर
पूजते हैं प्रेम से।
फिर पूजते हैं, सत्य के उस देव को
विश्वास.. है, की..
देव... हैं,
सहायक, वह
हर किसी के.. एक जैसे..
सत्यधर्मा हैं, नियंता हैं
बदलती इस नियति.. में, चहुंओर
फैले.. एक से।
कल्याणनिधि,
वे चमत्कारी..., विभवधारी..,
अन्याय हन्ता.., देव.. सारे,
अद्भुत अलौकिक शक्ति से, सम्पन्न... हैं।
साथ.. देंगे,
हमेशा, वे धर्म का,
सत्य का.. पीड़ित, दलित, का
हर स्थिति में, हर काल में,
हर ताप से,
वे त्राण देंगे, एक सा..
इसलिए, हम पूजते हैं, सत्य.. सा
उन सभी को।
श्री "सत्य नारायण" प्रभू की,
ठीक.. वैसे, आज भी, सुनते.. कथा हैं,
जो जहां हैं, विश्व में,
बंधु बांधव सहित, बैठे प्रेम से।
चाहना है
आज.. मेरी..
सत्य ही यह.. प्रतिष्ठित हो,
समाज.. में, स्वयं.. में, सरकार.. में
प्रत्येक जन.. में।
जय प्रकाश मिश्र
संप्रति: काशी (लखनऊ वासी)
Comments
Post a Comment