कौन है? जो बनाता है चित्र ऐसा!

भाव: हम सभी पांच परतों में बने हैं, बिल्कुल बाहर अन्नमय आवरण, अंदर प्राणमय, पुनश्च मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश क्रमिक स्थित है जो हमें अस्तित्व प्रदान करते हैं। इन्हीं में स्मृति, या मानस पटल मनोमय कोश में होता है जो मन की उदात्त भावनाओं को विचित्र चित्रित कर हमे उत्स से आपूर्ण करता रहता है, इसी पर कुछ लाइने आपके आनंद के लिए प्रेषित हैं।

वह!  
कौन है ?  
जो बनाता है चित्र ऐसा! 
विहंगम, 
मधुरतम, जीवंत-तम..

उकेर.. देता, 
मानस.. पटल पर, 
सत्य.. ही वह.. 
ओरिजनल... से, 
और.. बेहतर.. और सुंदर!  

मणिमय.., मनोमय.., 
मनोरम..।
किस.. तरह से 
मुस्कुराता चित्र वह..
कैनवास के 
बिना ही।
स्मृति पटल पर! 

हंसता.. हुआ, 
खिचता..., मेरा, मन
बांधता... मुझे रज्जुओं में 
अपने संग।
संवेदना को जगाता है, हृदय में।

मुस्कुराता देखता हूं 
चित्र को, उस..
खो.. गया हूँ, 
गली.. में, उस दौर.. की
ठीक... वैसे, 
आज भी, बालक ही हूं! 
देखता हूँ!  

देखता हूं! चित्र... को उस..
चल.. रहा है, 
बोलता.. है, बुलाता.. है, 
मौन.. ही! 
आ चूमता.. है 
होठ.. मेरे,
स्पर्श.. करता हिल रहा है, 
कांपता सा! 

एक ऊष्मा घेर कर मुझको खड़ी है,
बाहुओं में कस गया हूं 
कहीं मैं! 
मगन हूँ, तरंग में, मैं...
उन... उर्मियों में, डूबता.. हूं 
कौन हूँ मैं, खोजता हूँ, 
समय के पट टाल कर मैं देखता हूं,
छंट गया बादल तभी
मैं नग्न हूँ।
नहीं! मैं परिधान में हूँ, 
देख कर! संतुष्ट हूँ।

पग दो 

एक घना बादल उमड़ता.. 
मन-आकाश.. में
उत्तेजना.. का,
स्मृति का,
रूप
में पूर्व के आनंद का
पूर्व के उन सुख, दुखों का 
जिया था 
पहले.. कभी..
पुनः ही, उन स्थिति में
हम कहीं 
पर पड़े हों, मिले हों, 
आ घेरता है
एक बादल उमड़ता..
आगोश में भर, दूर.. हमको फेंकता।

उत्तेजना.., संवेदना.. बहनें, सगी..
एक.. ही, के... साथ.. 
रहती.. दूसरी..
संवेदना है, सरल सीधी, वास्तविक! 
उत्तेजना है रंग रंगीली, काल्पनिक! 
उड़...  रही, उत्तेजना उन...
बितानों... पर, शिखर... पर
पर... फड़फड़ाती, उर्वशी... सी।
हावी.. है ये, संवेदना.. पर 
जो.., मूल.. है,
हृदय की अनुभूति पर 
है अभी उतरी नहीं,
उसके पहले राज रजती 
उत्तेजना यह बलवती
प्रिय अनुभूति... को, 
अनुभूति रस आनंद को, ले.. डूबती। 

जय प्रकाश मिश्र
भाव: लोगों में भावनात्मक उत्तेजन इतना प्रबल होता है कि मूल क्रिया का आनंद ही नहीं आ पाता और तब उत्तेजना के साथ ही संवेदना भी दम तोड़ देती है। अतः उत्तेजन से सदा दूर रहना चाहिए।


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