उसने पूछा 'प्रेम' क्या.. है?
उसने पूछा
'प्रेम' क्या.. है?
मैने.. कहा, एक् स्वतंत्रता,
तोड़ता.. हर बांध.. बंधन.. उछलता..!
अबोध शिशु की, प्यारी.. हंसी सा,
भीतर कहीं, सपनों में खिलता!
निर्मल कमल सा,
सौरभ भरा,
यह
दुलकता!
दूर.., प्रिय! अति.. दूर
संसार के इस पंक की, दुर्गंध.. से
दुनियां में अपनी, मानसिक ही, मगन.. रहता।
महकता..
अन्तस.. में यह!
केवड़ा सी गंध लेकर,
बेसुध.. सा करता, दूर से, भी
प्रभावी... यह! विकल.. करता, बेधता
नव कल्पना को ओढ कर
रंग भर कर फुदकता,
मानव.. मनों में।
रंग
बदलता,
क्षण अनुक्षण...
रूप धरता.. विलक्षण!
यह मन, हृदय को विवश करता
जीतता है, हरण करता
बुद्धि का, विवेक का
धैर्य का,
पागल बनाता, मथन करता
रात दिन, अपरवश
प्रिय जो है
करता
प्रेम
है।
चहकता..
उमंग भर भर,
नाचता, तोड़ता तटबंध
सारे.. रीति के, संबंध को विच्छिन्न करता
नजदीकियों के!
सकल ही
दूर..
सबसे दूर करता,
फिर भी मचलता, प्रेम है।
निर्विघ्न हो,
भय हीन हो.. हो..
हे प्रिये! कल्पना के थाल में
जलते हुए घृतदीप पर
यह लालिमा
जो
पड़ रही है,
शिव अर्पणातुर पुष्प की,
कामादि हंता भाव की आभा लिए
उर.. उतरती... एकांत में
जादुई सी शक्ति है
जो...प्रेम है।
मन
घेरता यह,
बांधता..प्रेमी हृदय को,
आगोश में ले डोलता,
बिन बताए, विश्व में,
प्रेम की सब
पादुका!
बस
पैर की... जितना बताया है अभी...
प्रेम इनसे अलग है...
स्वर्गीय है
वह ईश का ही रूप है।
एक दिन! यह प्रेम!
निर्वासित... हुआ था! इंद्र से,
उस स्वर्ग से..
जो छीजता ही है नहीं.. अमरत्व से।
पर! प्रेम पर अंकुश वहां था,
पर प्रेम का अंकुर वहीं था!
संकुचित हो हृदय में
एक अप्सरा की
नाभि में,
सोया पड़ा था।
बहिष्कृत था स्वर्ग से, निर्वसित था
इंद्र से।
पर पल रहा था,
स्वर्ग.. के ही, गर्भ में।
प्रेम तो
एक विस्मृति है स्वयं की
पद, प्रतिष्ठा, स्थान की, अभिमान की
पतन है यह, मिलन है यह, उठन है
दो हृदय की,
तोड़ती हर बंध.. हो निर्द्वंद,
ख़ाब में.. किसी स्वप्न सी
चिंता नहीं यथार्थ की।
यह धार है, आंधी है रे!
बहती हुई...
अंधी.. हुई! ना देखती.. कुछ
बस देखती है, प्यार के संभार को,
एक.. होते हैं, हृदय,
दोनों तनों के
दृष्टि से अतिदूर उस धुंधले क्षितिज में।
नजर आते अलग सबको
मानुषी इन नेत्र से।
नियंत्रण से दूर यह,
मासूमियत का रूप यह
विद्रोह को नहीं जानता,
प्यार में ही है पगा,
प्रेम जिसने भी किया,
वह खो गया,
प्रेम ही वो रह.. गया।
जय प्रकाश मिश्र
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