सोचता हूं बुला लूं, एक शाम उसको।

सोचता हूं! 
बुला लूं, एक शाम उसको,
डिनर पे, 
या.. डिनर के, बाद... ही
परिचय करा दूं! 
इष्ट मित्रों सहित, सब... से।

डूब पाए, रंग ले, ये और 
गाढ़ा..
आरक्ता सूरज... 
उससे पहले, 
किसी सुरमयी सी शाम में, 
मिल बैठ संग-संग..
आनन्द में, हम! खुशियां मना लें, 
प्रिय! और प्रियतर! 
एक रस हो, 
अतिथि.. के संग, 
उसके.... भी, रंग.., रंग।


शाम सी 
वह, धुंधलती, 
उड़ती.. है, फिरती.., 
गगन में, 
बेलौस हो, टूटे परों पर! 
उछलती, 
भारी हुए माहौल में,
पग..!  
धीमे, रखती।
जानती हो
कौन है
वह मित्र मेरी! 
मित्र मेरी, एक.. उर्वशी है।
उर्वशी..
वह.. मृत्यु मेरी, प्रिय! मृत्यु.. मेरी।

डरो.. मत, वह सत्य है,
मीठी.. भी है।
प्यार से.., पकड़ो उसे..
पकड़ते.. हो, जिस.. तरह 
हर.. मरणधर्मा, 
अपनी... प्रिये! प्रिय.. वस्तु को
बस उस तरह ही।

वह! साथ देगी.., और आगे, 
सगे जब हो दूर, तुमसे, 
मुख मोड तुमसे, 
पीछे हटेंगे, 
और तुम यात्रा करोगे
अकेले! 
बस साथ उसके 
अतलांत से, अनंत.. की।
कहा था गोरक्ष ने, 
मरण.. मीठा, होत... रे! 
अवधू..., 
बस.. समझ... से 
मरण.. मीठा, होय... रे! 

मैं जानता हूँ! मानता हूँ, 
शुरू से...
अरे, वह.. साथिन मेरी रे! 
साथिन.. मेरी! तो वही रे! 
इसलिए तो कह रहा हूं! 
सोचता हूं! 
बुला लूं, 
एक शाम उसको,
डिनर पे, परिचय करा दूं! तुम सभी से...
वह मित्र मेरी, उर्वशी रे! 

पग दो: अदृष्ट मेरा और मैं, 

जानता हूँ! 
अदृष्ट मेरा, और मैं.., 
संसार में, बस और क्या है? 
शेष.. क्या है?  
कुछ नहीं..., रस.. ही नहीं, 
असारे.., संसार में..
इनके बिना, यह विश्व क्या ! 
भूला हुआ 
हो स्वप्न कोई.. वह भी नहीं।


परिचय हुआ था, 
रसों... से, 
विनिमय हुआ था, रसों.. में
रसो वै सः जानकर
रसों का आधान धर
परिणय, हुआ था रसों से।
रसों के इस प्रणय में, सबकुछ हुआ था
अदृष्ट ने 
मेरे यहां इन रसों में
सुख, दुखों संग 
राग का अनुभव किया था। 

अब क्या हुआ यह..
संसार के इन रसों बिन, 
यह कल्पना के परों पर, 
चढ़ घूमता है
अनुभूतियों.. की तितलियों पर.., 
आनंद में, 
यह बिहरता है, हेम नभ में।

शेष कर, रस विधानों को, 
किस.. विधा से.. 
झूमता है,
क्या फूटती निर्झरी कोई मिल गई है
आज इसको, आनंद की
अन्तस में इसके, नृत्य करती 
योगिनी सी..  पूछता हूँ! 

जय प्रकाश मिश्र


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