एक् ऊर्जा.. निकलती ही हम सभी से..।
सोचता हूं!
यह पुण्य क्या है पाप क्या?
गुण ही क्या ये,
अवगुण.. भी क्या हैं!
कहां से ये उपजते हैं,
कौन इनको डालता है किस तरह?
भीतर मेरे ? किस रूप में,
ये.. आ.. समाते
हर किसी में, जन्म के ये.. बाद में।
देखता है एक बालक,
ध्यान से परिदृश्य को,
अपने जनों.. को,
अतिथियों को..
साधुजन, अतताइयों.. च निकृष्टतम.. को,
एक सा..
वह! तटस्थ.. हो!
एक ऊर्जा.. निकलती है, सभी से...
तभी तो हम बालकों को,
देखते.. हैं,
मुग्ध.. हो!
यह पुण्य क्या है पाप क्या?
गुण ही क्या ये,
अवगुण.. भी क्या हैं!
कहां से ये उपजते हैं,
कौन इनको डालता है किस तरह?
भीतर मेरे ? किस रूप में,
ये.. आ.. समाते
हर किसी में, जन्म के ये.. बाद में।
देखता है एक बालक,
ध्यान से परिदृश्य को,
अपने जनों.. को,
अतिथियों को..
साधुजन, अतताइयों.. च निकृष्टतम.. को,
एक सा..
वह! तटस्थ.. हो!
एक ऊर्जा.. निकलती है, सभी से...
तभी तो हम बालकों को,
देखते.. हैं,
मुग्ध.. हो!
हो...! बालकों से...।
और बालक! तौलता है,
दृष्टि अंतर्दृष्टि से..
और बालक! तौलता है,
दृष्टि अंतर्दृष्टि से..
हर विचलनों.. को
हर किसी को,
शांति से, सद्भाव से, अतिप्यार से।
हर किसी को,
शांति से, सद्भाव से, अतिप्यार से।
संस्कार.. की, और गुणों.. की
हमारे तन मनों में
जननी यही.., समदृष्टि ही
संसार में।
संस्कार की जननी यही.., संसार में।
तटस्थ होकर,
वास्तविकता देखना,
प्रिय..!
शांति.. से, अति.. प्यार से।
इसी से तो
चिपक.. जाती बात वो.., अन्तस पटल पे..
चित.. तेरे, आजन्म को...।
मूक हो..
जो देखी गई थी, शांति में,
प्यार से, इस विश्व को।
कुछ कर्म है जो.. श्रेष्ठ हैं, वे पुण्य है
कुछ कर्म हैं जो.. हेय हैं वे पाप हैं,
संसार में।
एक चादर कर्म बुनता, अदृष्ट ही
अंदर मेरे
दिखता नहीं, खुद, मुझ को.. ही रे!
सृष्टि करता, गुनावगुण का हर किसी में,
समा जाता आत्मा के गहवरों में।
सर्प के, उस...
मृत्यु रूपी, दंश का,
संज्ञान.. ही..
मार.. देता सर्प को,
जननी यही.., समदृष्टि ही
संसार में।
संस्कार की जननी यही.., संसार में।
तटस्थ होकर,
वास्तविकता देखना,
प्रिय..!
शांति.. से, अति.. प्यार से।
इसी से तो
चिपक.. जाती बात वो.., अन्तस पटल पे..
चित.. तेरे, आजन्म को...।
मूक हो..
जो देखी गई थी, शांति में,
प्यार से, इस विश्व को।
कुछ कर्म है जो.. श्रेष्ठ हैं, वे पुण्य है
कुछ कर्म हैं जो.. हेय हैं वे पाप हैं,
संसार में।
एक चादर कर्म बुनता, अदृष्ट ही
अंदर मेरे
दिखता नहीं, खुद, मुझ को.. ही रे!
सृष्टि करता, गुनावगुण का हर किसी में,
समा जाता आत्मा के गहवरों में।
सर्प के, उस...
मृत्यु रूपी, दंश का,
संज्ञान.. ही..
मार.. देता सर्प को,
बिना सोचे और समझे
कुछ इस तरह, ही बने हैं
कुछ इस तरह, ही बने हैं
संस्कार... रे!
जय प्रकाश मिश्र
जय प्रकाश मिश्र
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