क्या हुआ है? अचानक.... यह...
प्रकृति.. तो, यह...
सहेली... थी,
नवेली थी, प्रिय.., मधुर.. थी।
इतने...
दिनों... से
साथिन... हि, थी...इन.. मानवों की। हर..,
दुर्दिनों.. में,
त्राण.. देती थी हमे..,
यह.., सहोदर सी...।
क्या हुआ है?
अचानक....
यह...
आज कल!
व्यवहार इसका,
इस तरह बदला... हुआ है!
सभी के प्रति...
त्रास... देती इस तरह!
सोचता.. हूँ,
क्या... नहीं, अब...!
एक.. मत, हम.., इस प्रकृति संग!
क्या!
चुन लिया है,
आदमी ने, स्वार्थ.. को
निज,
सबसे ऊपर...
शिखर...तम से और आगे
उच्चतम!
उन्मत्त... होकर!
वापसी... इनकी, नहीं.. है।
चलो... मिल...
एक... बार, देखें..
चोट...!
इस.. घायल.., प्रकृति की,
कुछ.. नहीं, तो..
जर्जरा..,
अपराजिता..
से.. हो, चुकी.. पराजिता,
का...
उर तो, छू... लें।
ढाढस..
बंधा
दें,
सांत्वना के शब्द, हम थोड़े से, कह दें..!
अनुनय.. करें!
उस...! शिकारी.. से,
नाथता.. है, नाक.. इसकी,
नापता... है, वक्ष... इसका, दूषित करो से
छोड़... दे,
वह.., बांध.., बंधन..!
मुक्त कर दे, प्रकृति है यह, मां हि, है यह!
हम सभी की आदि से..
रक्षक रही ही
जन्म से।
तृप्ति..! सबकी..., जरूरी रे,
आदमी..! पिशाच..!
क्या... रे!
सोच
तो,
कैसे रहेंगे, पेड़ पौधे,
विहंगम ये!
कूदते…,
भागते.., ये हिरन.. प्यारे!
अबोल पशु पक्षी सभी रे!
इसलिए तो कह रहा हूं
मुक्त कर दें, खोल दें,
धाराएं... इसकी,
बह..ने दें,
उच्चतम से निम्नतम,
अपनी प्रकृति में, अपनी ही रव में
नृत्य करते, गान गाते
बिना... बंधन! स्वभाव.. में।
क्यों हुई..?
यह... बालिका, से..
कालिका...,
इतनी भयानक! क्रूर... तम!
कारण.. कहां है?
हम.. जानते हैं...
हम.. आदमी हैं, नभों को भी
नापते हैं!
पर.. स्वार्थी हैं!
जल... विद्युतों के,
जल... संचयन के,
नाम पर
अधिकार अपना
जलों.... पर भी, मानते... हैं।
क्या..
करे वह!
कहां.. जाए,
रास्ता.. तो दो, उसे..
रास्तों... पर, मित्र.. उसके..
तुम..!
बिना सोचे.., बिना समझे..
कितने.. दिनों से,
दबाते..
बस उसी को
घर बना कर, बसा कर
सुंदर.. शहर, निर्द्वंद.. होकर
तुम रह.. रहे हो...
दशक से, शताब्दियों से,
कब्जा किए हो!
मौज में हो,
सीमित उसे तुम, नालियों में
कर दिए हो!
हक.. लिया, है आज उसने...
बैठ कर
तुम रो.. रहे हो...
आतताई! प्रबल हो तुम!
मतलबी.. हो!
खाली पीली दोष उसको दे रहे हो।
खाली पीली दोष उसको दे रहे हो।
जय प्रकाश मिश्र
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