पंख देखे, समय के उजले नहीं थे!

वह सजल था, वह सरस था
देखा था मैने... 
आंख.. से,
प्रिय..!  मनोहर.. था।
लीक...
कोई, सुनहरी.. अति क्षीण.. पतली, 
झक सफ़ेदे बादलों पर, 
चमकती..
किरणे समेटे चन्द्र की, 
निज तलछटों में, 
रजत... सी
सूर्य की... 
उन, रश्मियों सी.. खेलती..
मुक्त... 
हां! उन्मुक्त ही, उसकी हंसी, 
अधरोष्ठ पर थी खेलती,
शिशु सदृश ही...
जब जब मिला मैं! 

आद्यंत यह लाइने उन अल्जाइमर्स से पीड़ित लोगों को आदर से समर्पित हैं। जो इसे नहीं पढ़ सकते।

कौन था यह! 
सिपाही... 
बस, एक नाविक!  
समय की तिरती तरी पर.. 
नाव.. खेता, आगे.. बढ़ता, लूटता.. 
लुट.. 
कर स्वयं.., सबको लुटाता, हंसाता, 
प्यार करता जिंदगी को
चिकित्सक 
था।
दूर... कस्बे में किसी.. 
अति दूर... सबको त्राण देता, 
व्याधि दुख.. से, 
सुख से मिलाता, क्षणों में, वह अनन्यतम था।

अल्जाइमर्स बीमारी, कोई दवा नहीं

समय का यह चक्र है,
कठिन.. है, 
दुस्तर.. बहुत है...
जो हार... को, नहि जानता... था,  
"हार" पहने जीत.. का, 
नित.. घूमता था,
समय को नाथे हुए था, 
नथों में, 
किसी पुष्प सा, किसी माल में, 
अत्यंत खुश था।
थैलियां जितनी सिली थी 
वसन में, 
सबमें भरे वह लक्ष्मी को 
ठूंस कर...
प्रिय..,! कितना मगन था।

फंस गया, उस चक्र में... जो जाल है
निष्ठुर! निरा..
प्रिये... अप्रतिम है,
क्या कहूं कैसे कहूं!  
अपनों के करतब, से दुखी हो
मछलियों सा, 
समय के उड़ते परों को देखता
एक दिन! 
अल्जाइमर के झोल में वह आ गिरा।।

फिर क्या हुआ...
स्मृति से..., 
विस्मृति को पार करता
हर,.., 
क्लेश की जननी, 
प्रिये... "पहचान" को ही, छोड़ कर... 
आत्मगत ही मैं कहूं!  वह हो गया।

निर्वाण में है, 
निर्द्वंद है, दूर है हर व्याधि से,
अपने में खुश है, 
या.. दुखी... 
कुछ बोलता.. वह, अब... नहीं है।
बिन थैलियों का शर्ट 
अब.. वह, पहनता... है,
कोई गिफ्ट पाकर, 
जगह.. 
अब भी खोजता है, कहां रखे...।
जिन थैलियों को, 
उस समय देखा था मैने...
वक्ष पर...
निज आंख से, 
आज भी वह ढूंढता है.. उन्हें ही।

क्या करेगा, कुछ नहीं! 
संभव नहीं! 
पर.... कुछ कहीं है, शेष... अब भी, 
क्षीण... ही, 
अपरवश है, तैरता...
आदतों में, आदतें बन साथ देता..
इस लिए तो कह रहा हूं
पंख देखे, समय के उजले नहीं थे!  
काले ही थे, 
जब तलक हम
किस भी तरह इस विश्व में थे।

जय प्रकाश मिश्र









 


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