तुझसे नहीं, तो और किससे मैं कहूं! हे शिवहरे!
तुझसे नहीं, तो और मैं.. किससे कहूं, हे शिव हरे!
तूं..! जानता है,
सब... मेरा,
हर.. सच मेरा,
बाहर.. मेरा, भीतर.. मेरा
क्या.. छुपाऊं, क्यों.. छुपाऊं,
तुम्हीं.. हो
अंतःथल... मेरा।
मैं खुश ही था,
रोया, बहुत... कम..
सफल... था,
अपनी पहुंच.. तक, उच्चतम..
मेरी ख्वाइशे थीं, निहायत कम..
इतनी.. सफलता, बहुत थी,
मेरे.. लिए,
मुझे चाहिए क्या..?
छोरा.. निरा, मैं गांव का..,
बौउड़म.. हि, था..।
पस्त था पर मस्त था,
तेरे, भरोसे,..
विश्व में आश्वस्त था।
साथ तेरा, साथ.. था,
इसलिए
औरों से, ऊंचा.. माथ था।
गिर चुका था, बार एक.. दो..
तुम.. जानते हो!
रुक.. सका, किस.. वर्ज पर,
मैं...
तुम.. आ गए.. थे, समय पर..।
डूब जाता..,
बह.. भी जाता...
सच कहूं!
तिनके.. से बदतर,
शेष.. बचता, क्या इधर तब
धार... तीखी, तेज... थी,
पर, बच गया, थोड़ा कट.. गया
उन.. रास्तों से, हट.. गया।
तेरे किए, थोड़ा आदमी... मैं, बन.. गया।
सब.. ठीक है,
घुटन थोड़ी..., जरूर है,
पर ठीक.. है,
शेष.. रह जाए, यहां.. कुछ
काम..,
मन.. की, ख्वाहिशें..
अदावतें,
कुछ सिलसिले, मुरउवतें
नज़रे नबीयत सल्तनत की
हर्ज क्या है?
ठीक.. है।
जानता हूं, बड़ा है... तूं!
यह विश्व तेरा.., दीखता है, तेरे जैसा!
कुछ और बेहतर।
कोई.. कह.. रहा था,
समझता हूं!
तेरी जान को, सौ.. सौ.. बखेड़ा
रातोदिन है,
हर समय.., हर जगह...
पर, क्या... करूं!
अब.. अंत मेरा..,
किसको... बुलाऊं!
किसको सुनाऊं! कौन... मेरा!
तुझसे नहीं... तो,
और.. किससे, मैं कहूं!
क्या? तुझसे.. प्रिय!
इस विश्व में कोई.. और मेरा!
देख!
मुझको..
सोच! मेरी.. हाल को,
मुमुक्षु.. हूं अब.. नाथ, तेरा..
देख मेरी... शीलता,
द्वार तेरे हूं खड़ा हूँ!
विनीत हूं, शरणागता हूं!
यह दुराग्रह..!
क्या काम मेरा...?
कुछ तो बता, अब क्या..करूंगा?
अंत.. है, इस विश्व.. से
सच.. विदाई का!
इसलिए तो कह रहा हूं,
सामने आ...
दरस.. दे, थाम ले,.. हाथ मेरा।
समय है
अब अंत का, त्याग... दूंगा
ये.. बसेरा...।
तुझसे.. नहीं,
तो और.. मैं.. किससे
कहूं!
तुम जानते हो सब.. मेरा,
हर.. सच मेरा,
बाहर मेरा, भीतर मेरा
क्या छुपाऊं, क्यों छुपाऊं,
तुम्हीं.. अंतःथल... मेरा।
हे! शिव..मेरे, हे मेरे.. बाबा,
काशी.. तेरी, यह पावनी!
मुक्ति की है दायिनी!
सभी का,
तूं.. ही अकेला, मुक्ति.. दाता!
जय प्रकाश मिश्र
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