ॐ मणि पदमे अहम!
जीवन में हमारा किरदार हिन्दू अवधारणा अनुसार कहे या सत्य ही, द्वैत में जीवन जीता है। एक परम स्वतंत्र, नितत्व सर्वदा वर्तमान साक्षी आत्मा और दूसरा जीव भाव जो अपना 'मै' या अहंकार है इनके साथ द्वैत में हम जीते हैं। "मैं" निजत्व या स्वार्थ से, जुड़ा होता है, यह "मेरा या अपना" के घेरे में बंद, सीमित, सर्वथा सुख दुख से ग्रसित रहता है। इस मैं का निर्मल स्वरूप, वह है जो विराटता धारण कर अपने से ज्यादा लोक को मान्यता देता है। मन के सार तत्व को समझ लेता है, मन को बड़ा कर, विश्वास की आंतरिक शक्ति का आश्रय लेकर शुद्ध हृदय से, तुच्छ कामनाओ को छोड़ता, विकार मुक्त योगी की जैसी स्थिति में अवस्थित रहता है। जहां दुख से परिचय ही नहीं। जो भी है, वह यथार्थ है। हर स्थिति चाहे जैसी हो कर्म का परिणाम मात्र है वह यही जानता है। वह लाभ हानि या निजी जीत हार से अलिप्त अच्छा या खराब जो भी है प्रभावित नहीं होता। सारे परिणाम मात्र परिणाम हैं, उसका अपना इस समष्टि से निर्धारित होता है, अलग से कुछ भी नहीं। जो कुछ दुनियां में है वह कार्य कारण और कर्म का परिणाम है, उसमें मैं और मेरा का कोई भाव ही नहीं। यही तटस्थता है। संत स्वभाव कमल की तरह है। जल यानी दुनियादारी से दुराव नहीं लेकिन जल में संलिप्त भी नहीं। एक न्यूनतम दूरी वह बना कर रखता है, जल पास आए तो ऊपर चला जाता है, नीचे जाए तो नीचे कीच में रहकर भी निर्मल मन, हृदय और सोच रखता है। सूर्य से तप का संबंध रखता है न की चन्द्र की चांदनी के सुख से लिप्त होता है। सुख में संकुचित, हो जीवन गुजारता है। उसका जीवन तप के देवता सूर्य से जुड़ा है, कुछ भी वह अंधकार में अर्थात छुपाता नहीं उसका जीवन खुला हुआ है प्रकाशमय है। अनंत सुख का द्वार मुक्त होने में है। यह मुक्ति किससे सांसारिक परिणामो से, मुक्त न की कर्म से। राग भार है, मोह लस्टा है चिपकन है। लेकिन सब मिलकर एक वृहद शून्य है इससे अधिक कुछ नहीं, सारे, रंग रूप, गति, आकृति, जीवन और चेतनाएं सबका अंत एक रिक्तता ही हैं। इससे अधिक नहीं।
आज की पोयम संसार के दुखों पर ही है कि दुख दो तरह के ही होंगे पहला जिसको समाप्त कर सकते हैं तो उसके लिए कर्म करे और दूसरा जो समाप्त नहीं हो सकता जैसे किसी अपने की विछोह, तो यह सभी के साथ ही है अतः यह जीवन जा भाग है मान कर आगे बढ़ें।
बोधिचित्त
तुम हो नहीं.. क्या इसलिए...
दुख से दुखी हो!
पीड़ित बहुत हो! कष्ट में हो!
मार्ग क्या अवशेष कोई है बचा ?
तुम बच सको!
इस कष्ट से..
तो... दुखी, क्यों हो!
पार आओ, अपनाओ इसे
मार्ग से इस निकल.. आओ!
संताप में फिर क्यों
फंसे हो,
"पर" हैं अगर, तो... उड़.. दिखाओ।
बोधिचित्त...
तुम हो नहीं, इस लिए
दुख से दुखी हो!
पीड़ित बहुत हो, कष्ट में हो!
क्या मार्ग कोई है नहीं, तुम निकल पाओ,
तो... दुखी क्यों ?
इन दुखों को साथी बनाओ!
धैर्य से उसे सह भी जाओ,
यह मार्ग है, ये सोच लो।
पर दुखी मत हो!
दुख यहां सामान्य है
दूर कर दो, कर सको... अन्यथा
गले इसको तुम लगाओ।
दुख यहां सभी को है, मान जाओ..,
सभी को है, दुख यहां तुम मान जाओ..।
जय प्रकाश मिश्र
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