भीख…. लेकर ब्राह्मण, शिखर था, इस देश का।

भाव: मुक्तक एक विधा जिसमें हर चार लाइनों में अलग अलग भाव होते है। जीवन अनेक जरूरी कड़ियों से मिल कर बना है। हर कड़ी अपनी जगह महत्वपूर्ण होती है। कुछ ऐसी ही कड़ियों को आप के सामने रख रहा हूं आप पढ़े और आनंद लें।

क्रूर भी, कोमल कहीं हैं

रस भरा हैं, बंधनों में 

टूटते हैं तंतु.. प्रिय जब 

संवेदना को खींचते हैं।

खोलते हैं राज उसके

हृदय में क्या क्या भरा है।

भाव; संसार जैसा दिखता है वैसा होता नहीं यह रहस्यपूर्ण है जैसे जो बाहर क्रूर है, वही अपने घर या अन्य जगह नर्म होकर रहता है। उसके असली गुण उसके प्रिय संबंधों में, साफ साफ दिखते है।

पुत्र प्रतिनिधि आत्मा का

संतति, हृदय है, काल का

श्रृंखला सब, पाश की हैं

मोह…. सबमें… है… बंधा।

भाव: अपने संस्कार, छाप हम अपनो के माध्यम से दुनियां में छोड़ जाते है। काल का रहस्य इस दुनियां की निरंतरता में बसा है और यही कठिन कालपाश भी है। जिसमें हम फंसे हैं।

सत्य जागा, नीद में, 

जब सो… रहा वह! 

चेतना तब थी नहीं ,

क्यों, रो… रहा अब! 

भाव: संसार सुंदर और अच्छा लगता है जितना, उससे लाख गुना कठोर इसका यथार्थ है। जिन को अपना दंश देता है वह रो भी नहीं पाता। आंसू सूख जाते हैं।

भीख…. लेकर ब्राह्मण 

शिखर था, इस देश का।

अब शिखर पर, जो ब्राह्मण है

ब्राह्मण ही ना…… रहा।

भाव: आपको शिखर पर आपके गुण ही ले जाते हैं। और जब आप उन्हें छोड़ देंगे तो आप कोई भी हों नीचे गिर जाएंगे। पद प्रतिष्ठा आपके कर्म पर निर्भर होती है।

यदि शोक से वो दूर है,

अवमानना को लांघता है

हीनता भी है नही 

तो, शेष वह, बस ’त्याग’ है।

भाव: तत्व ज्ञान शोक हर लेता है, जो अपमान पी जाय वही आगे बढ़ पाता है, जिसमें अपनी गरीब होने पर हीनता न आए अपने गुणों पर विश्वास रहे वह श्रेष्ठ त्यागी ही होता है।

अब मैं नहीं, मेरा नहीं 

अब तूं नहीं, सब एक है

मैं हूं जहां पर पवन हूं,

अब विहरता चंहुं ओर हूं।

भाव: एक तत्व दर्शी आदमी समता में जीता है। उसका जीवन सहज और आनंद से भरा होता है।

संसार उसका खेत है

विश्वास बोता जा रहा

शांतिजल से सींचता,

उग रही है…. आस्था….। 

भाव: अच्छा आदमी फसलें नहीं लोगो में गुण बोता है। स्वयं शांत, स्थिर, और विश्वास का स्तंभ होता है। सबके विश्वास की रक्षा करता है।

डालियां समदृष्टि उसकी

त्याग.. है सौंदर्य.. अदभुत

करुण.. आंखे पुष्प.. सी हैं

चित मुक्तता… ऐश्वर्य… है।

भाव: सम्यक, परमशांत दृष्टि, करुण स्वभाव, कम से कम में जीवन यापन, और चित की स्थिरता से आनंद की अनुभूति ही अच्छे आदमी की पहचान है।

एक रस शीतल सुखद

ऐश्वर्य उसकी भावना

शेष कर, हर शेष, को

आनंद ही परिणाम है।

 भाव: परमात्मा में विश्वास, मन से खुश रहना स्वभाव, कुछ चाहिए नहीं, विजित चाह वाला आनंद रस में ही बहता है।

त्याग हो, हर शेष.. का

अवहेलना.. संसर्ग की

मन को जीते जीतता है

दिव्य आभा… तेज की।

भाव: मुक्त भाव, मन पर नियंत्रण, राग से दूर वह तेजवान होता है।

क्या प्रेम के पीछे छिपा है

स्वार्थ देखो ठीक… से

घृणा… उसमे सनेगी ही

पाप… भी भर जाएगा

भाव: प्रेम देना है, मुक्त प्रतिदान है, यदि लेना इसमें आया तो इसमें स्वार्थ से पाप आना तय है।

जीवन… की जड़, 

यह घर… ही है

जीवन… पनपता इसी में,

रस ले… सरसता, समसता, 

है फिर समाता इसी में।

भाव: यह संपूर्ण संसार मात्र घर की भावना अर्थात मां पिता से ही बना है। इसी से इसी में इसी के लिए  लौकिक संसार गतिमान है।

कुछ तो है घर में समाया

अंत है हर मुश्किलों का,

जब कहीं, किसी.. आपदा में

फंस.. गए, घर याद.. आया।

घर याद आया, हर समस्या में, याद आया।

भाव: मूल इस संसार का घर ही है। आप स्वतः हर आपदा में इस पर आश्रित होते हैं।

एक सा संसार है

दुख सुख सना संसार है

कैसा दाता कैसा दास 

एक ही व्यवहार है।

भाव: तत्व दर्शी संसार को दुख ही मानते हैं। इसमें देने और लेने वाले दोनों अंत में दुखी ही होते हैं।

ढो रहा संसार को

कंधों पे अपने, 

जाति को,

संवर्ग को, अपमान को

मुक्ति का जो दंभ भरकर

घूमता है कौन है वह बोल तो।

मानव यही, मानव यही तो।


सामर्थ्य से क्या हीन है? 

भोग से वह ग्रस्त है? 

संवेदना का धोख करता,

हृदय से वह हीन है? 

चिरकाल से ही बह रहा कल

कौन इसको बुलाता है

गर्भ में क्या क्या छुपाए

खुद ब खुद ये आ रहा है।

भाव: संसार का चक्र कर्म सिद्धांत पर चल रहा है। सब जीव उसी क्रम में जन्म लेते है, जीते हैं और मरते हैं। पुनः जन्म लेते हैं।

भाग्य.... क्या है? 

स्वीकृति..!  

कर्म.. सारे, शेष.. अब! 

शेष.., सारा उत्स... है

मन.. की उमंगे, शेष.. हैं

तन.. की विकलता, शेष.. है।

एक.. गुच्छा, 

असफलता.. देखकर, डर गया वह? 

देख कैसे! भाग्य के पीछे.. खड़ा है।

भाव: भाग्य का अर्थ सब प्रयास बंद यह गलत है। असफल होने पर भाग्य को नहीं प्रयास को आंकिए और सुधार करिए।

सोचता हूं बैठा बैठा।

मैं मनुज हूं 

भाग्य दिनकर... का भी,  हूं... मैं... ;

सोचता हूं।

बढ़ के आगे चूमता हूं 

प्रयत्नों को! 

भाग्य का भी भाग्य.. 

मैं.... अब लिख.. रहा हूं! 

हो कहां तुम!  पास आओ,

मिल के बैठो, साथ आओ!  

कुछ नहीं है भाग्य देखो 

भागता एक भूत था, 

बिन लंगोटी, 

क्या तुम्हे, भी... पता था।

जब तक नहीं था ताड़ता... 

यह.. पास में बैठा रहा

जब इसे हूं खेदता.. 

यह जान लेकर भागता।

कुछ तो

इनमे है बराबर 

एक ही पृथ्वी पे हैं

एक संग ये जी रहे हैं

एक ही संग मर रहे।

आत्मा सबमें वही है

कर्म का अंतर है बस।

भाव: भाग्य नाम की कोई चीज नहीं, कर्म से दुनियां चलती है। भाग्य एक संकल्पना है एक पृथ्वी पर लोग जन्म लेते है, एक साथ जीते हैं सारी समस्याएं मानव कृत हैं। मनुष्य ही मनुष्य का अपराधी है। कर्म सिद्धांत सत्य है जो काम नहीं करेगा दुख पाएगा।

जय प्रकाश मिश्र

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