हे! सांवरे की सखी, मेरी राधिका..!

भावभूमि: यद्यपि श्रीकृष्ण और उनकी परा आह्लादक-शक्ति श्रीराधाजी, क्षण मात्र भी, एक दूसरे से अलग नहीं। फिर भी मां यशोदा विशिष्ट मातृभाव से आप्त अपने लाला बालकृष्ण कान्हाजी की प्रसन्नता हेतु, लली-राधा से अनुनय करती हैं। कहती हैं, मेरा कानू अभी छोटा है इसे भी अपने साथ तुम सब बाल-खेल में शामिल कर लो। इसी पर कुछ और संदर्भ को समेटते कुछ पंक्तियां आप के लिए प्रेषित हैं।

हे! सांवरे... की सखी, 

मेरी राधिका..!

एक बात.. सुन रे.. !

मेरे, श्याम.. को भी, 

खेल में, तूं!  साथ.. ले, ले। 

छोटा, है.. ये..., 

मैं... जानती.. हूं,

सब.. साथ मिलकर, 

श्याम को.. ले..., 

खेल.. अपना.., खेल रे।


सुन! बात मेरी..

प्रेम.. इसका देख..तो, 

तेरे प्रति.. अहा कैसा! 

विकल है,

ये.., रस पगा.. है,

तेरे.. ही, रे...!

हे! सांवरे... की सखी, 

मेरी राधिका... एक बात सुन रे! 


बांस.. की, 

इस, वंशरी... पर, 

अंगुलियों.. की, चाल इसकी

मोहिनी, गहरी... है कितनी

झिल..मिलाती.. देख तो।


श्याम छाया, चल रही हो, 

नाचती...

छन.. रही हो, चांदनी 

भूमि पर, चूहुल करती

पत्तियों.. की पेड़ से..

विरल.. घन, मन हृदय पट पे

प्यार भर, तेरे.. लिए.....

ध्यान.. से, 

एक बार, इसको, देख रे! 

हे! सांवरे... की सखी, 

मेरी राधिका... एक बात सुन रे!


सजीलो.. मेरो, श्याम.. है रे,

नान्ह है रे! 

बालक अबोधा, अभी है ये,

हाथ धर.. ले, 

नटखट है थोड़ो, ध्यान रख..

यमुना के तट मत डोल रे।

हे! सांवरे... की सखी, 

मेरी राधिका... एक बात सुन रे! 


जादू.. भरे, तेरे नैन हैं

चितवन तेरी है, बावरी

श्याम मेरो, साँवरो.. 

बालक.. है, री..! 

ऐसे.. इसे, मत.. देख रे! 

हे! सांवरे... की सखी, 

मेरी राधिका... एक बात सुन रे!

जय प्रकाश मिश्र

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