शून्य में दो शून्य देखें,
भावभूमि: आज हम अपने मूल शास्त्रों से दूर हो रहे हैं। पढ़ना तो दूर उनके बारे में भी जानते भी बहुत कम हैं। लोग पूछते हैं, वेद पुराणों में ऐसा क्या है जिसके लिए उसे हमें पढ़ना चाहिए तो समझें कि उसमें हमारे विश्व की ही नहीं इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की संपूर्णता में एक इकाई के रूप में व्याख्या ही नहीं उसका सत्यज्ञान भी गुथा है। हमारे वेद ज्ञान रूप हैं, नित्य हैं, इनके मंत्र सत्यनिष्ठ विश्वसनीय मनीषियों को मंत्रदृष्टा के रूप में प्राप्त हुए जो श्रुतियों में स्मरण कर विभिन्न समाजों द्वारा शताब्दियों तक जीवित रखे गए। महर्षि वेदव्यास जी द्वारा इन आदि सत्य के ज्ञान को शब्दरूप में सम्पुटित किया गया है।अब लिखित उपलब्ध हैं, वही तो वेद है। इसी पर कुछ लाइने आपके आनंद हेतु प्रस्तुत हैं।
स्वर्ण का एक पात्र है
स्वर्ण उसमें भरा है,
स्वर्ण के उस
हृदय में
सत्य
का जो बसेरा है,
वही तो, यह वेद... है।
वही तो, यह वेद... है।
किसने कहा! और क्या कहा!
यही तो, दो... मंत्र हैं।
विश्वास पक्का, मंत्रदृष्टा
ऋषि.. सरीखा
अगर है, तो.. वेद... है।
वही तो, यह वेद... है।
जो कहा, जिसने कहा
गर सत्य है, एक सा
हर काल में
बदलता, वह... है नहीं,
एक ही सबके लिए,
हर हाल में, स्थान में
तो... सत्य है,
वह सत्य... ही तो, वेद.. है।
वही तो, यह वेद... है।
शब्द.. सागर, ज्ञान.. के,
सब जानते हैं
पर ज्ञान.. खुद हों,
शब्द ये..,
ऐसा... नहीं रे !
ज्ञान.. ही तो, नित्य.. है,
प्राण.. है
इस चेतना.. के।
चेतना.. ही आदि है,
प्राण.. है,
उस सत्य.. का जो... नित्य.. है,
नित्य ही वह...., बेद है!
वही तो, यह वेद... है।
कब.. कहा, किसने.. कहा,
ये.. शब्द..!
काल.. बाधित, अगर है,
स्थान बाधित अगर है
तो सत्य... कैसा?
उसे छोड़ दो...
दूर हो!
वो... लवेद हैं, वेद हो सकता नहीं।
वह वेद हो सकता नहीं।
शब्द की सामर्थ्य देखें,
अप्रतिम... है,
पदार्थ की पदार्थता, (योग्यता)
इससे... जुड़ी है।
अपदार्थ होगा, पदार्थ....
सुंदर,
शब्द के बिन..
शब्द नश्वर, सच कहूं तो,
अक्षरों बिन..।
अ.., क्षर है जो...,
वो.. शून्य है,
कुछ भी नहीं... है,
मिल गया तो.. अक्षर हुआ,
अस्तित्व.. है,
दो शून्य देखें, ज्ञान के दो चक्षु हैं...।
सूर्य.. चन्दा.. चमकते,
दृष्टि देते... दो सितारे...,
गोल हैं, ये... शून्य हैं
आकार में...
जरा ध्यान दें, ध्यान दें!
तीन मिल कर, सृष्टि हैं...
संग संग हमारे।
शून्य के आकार की
अवधारणा
गोल है...,
आई कहां से..?
पूर्णता को, समेटती,
यह, सृष्टि... खुद में।
एक में, एक.. शून्य है,
सबसे... ऊपर
देखना एक बार फिर से
अर्थ क्या है!
शून्य भी तो एक है,
काल को खुद में समेटे।
शून्य भी तो एक है,
काल को खुद में समेटे।
क्रमशः आगे...
जय प्रकाश मिश्र
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