आदमी से, जानवर! वो.. हो गए, आगे बढ़कर

भाव भूमि: आज हम, हर जगह देखते हैं, जो आगे बढ़ा, चाहे पढ़ लिख कर या अपने प्रयत्नों से फिर उसका सर्कल बदल जाता है। जबकि वह जिन्हें छोड़ता है उन्हीं लोगों ने अपना निजी जीवन कमी में उसके लिए गुजारा। उसको पढ़ाया लिखाया और बिजनेस कराया। एक दीवार बन जाती है धीरे धीरे फिर दो दुनियाँ, वो आपसे अलग। यद्यपि इसके लिए हम भी कम जिम्मेदार नहीं। हममें से ज्यादातर लोग आज पुरानी पुश्तैनी जमीन बेंच कर अपने घर से गांव से रिश्ता ही खत्म कर रहे हैं। अपने सभी संबंधों को तिलांजलि दे, स्नेह को तोड़ रहे हैं और अपने बच्चों से अपने लिए संबंध बनाए रखने के लिए दुखी हैं। इसी पर कुछ लाइन पढ़ आनंद लें।

रेखाएं, गहरी... हुई हैं, 

बीच की,

दीवार.., थोडी, और,.. मोटी... 

हो गई है, विभाजन की, 

बीच... में, 

जब से वो..,  विकसित.. 

हुए... हैं,

आगे.. बढ़े हैं, खून.. पीकर.. 

पसीनो... में,   मेरे...  पलकर...!

सु सभ्य..., वो.. अब, हो.. गए हैं,

मुझसे, मुकर.. कर..!

भाव: आज गांवों से, छोटे शहरों से आए जो लोग आगे बढ़ जाते हैं वो अपनों के बीच एक अदृश्य अभेद्य दीवार खड़ी कर लेते हैं, विभाजन की गाढ़ी रेखा बना लेते हैं। अपने कर्तव्य से मुख मोड मुकर जाते है। जबकि उन्हीं के खून पसीने के बल पर वे वहां पहुंचे हैं।

क्या कहूं! किससे कहूं! कैसे कहूं! 

वो.. आदमी से, 

जानवर... 

सच..!  हो.. गए हैं,  आगे... बढ़.. कर ।


दूर.. मुझसे, अपनी मां.. से, 

हो.. गए हैं

सच.. कह रहा हूँ, 

बड़े आदमी.., 

खुद... को, समझ... कर! 

भाव: आज जो सभ्य लोग कहे जाते हैं उनमें अंदर एक विचित्र जानवर बसता है जो अपने से नीचे से दुर्बरताव और ऊपर के लोगों के सामने दुम हिलाता रहता है। अपने निजी जिंदगी में सगे लोगों से भी इनका बर्ताव मां पिता से भी अशोभनीय देखा जा रहा है।

सोचता था, उम्र.. का 

खुमार.. होगा,

बुखार.. होगा, 

एक दिन ठंडा.. पड़ेगा..

सुबह का भुला हुआ घर आएगा..

देख ना.... 

रेखाएं ये तब की, 

कितनी गहरी... हो गई हैं, 

बहुत... ज्यादा, नक्शों पर नहीं, रे.... !

मां बाप के, चेहरों.. के ऊपर।

भाव: शुरू में लोग समझते हैं ये आगे ठीक हो जाएंगे पर ऐसा नहीं, धीरे धीरे अपने सगे लोग इनके करतूत से चिंता की लकीरों में डूब जाते हैं।

कोई क्या करे?  हवा है!  

उड़ाएगी! 

साथ.. अपने, उड़ा कर.. 

ले.. जाएगी।

सोच.. तो, 

तुम.. भी उड़े.. थे, 

पर, बंधे... थे

संपत्ति... की उस डोर.. से.. 

जो लुभाती.. थी, बुलाती... थी

जरूरत थी, अभी, कुछ दिन ही पहले।

भाव: आधुनिकता की यह एकल परिवार की हवा है, सबको लग रही है और लोग इसे शौक से अपना रहे हैं। पिछली पीढ़ी हम लोगों की भी इसी से प्रभावित थी पर पुश्तैनी जायजाद के लाभ से कुछ कम मुखर थी। 

घर, बेंच... कर..

घर... 

बनाने की, 

जगमगाते... शहर में इस,

तोड़ कर तुम बंध सारे, छोड़ कर 

संबंध सारे, आ... गए थे, 

इस..

स्वर्ग में..

अब क्या हुआ!  क्यों रो रहे हो! 

भाव: हममें से ज्यादातर लोगों अपना पैतृक घर जायदाद बेंच शहरों में घर बना लिए और गांव की सामाजिकता से दूर एकाकी जीवन बिता रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले जब ब बच्चे छोटे थे साथ थे तो यह शहर का घर स्वर्ग लगता था। अब उनके जाते ही यह दुखदाई हो गया और वे नित्य जीवन को कोसते रहते हैं।

धो रहे हो, आंसुओं से, 

आज!  

जिस मुख-कमल को.. 

कीमत तो समझो...

देख कर 

तेरे रुऑसे.. से,  इसी मुख को

गांव जुट जाता था 

तब...

पूछता था!  क्या हुआ? 

तोड़ आए प्रेम वह...! 

तुम, 

कोसते... हो 

औलाद को, बच्चों को अपने।

भूल जाओ!  

प्यार! अब तुम, हर किसी से।

भूल जाओ, प्यार अब तुम, 

हर किसी से।

भाव: आज शहरों में अनेक अपने समय के प्रभावी लोग, तपे हुए लोग वीरान जीवन जी रहे हैं। उन्होंने अपने गांव घर और समाज से रिश्ता तोड़ लिया और समाज तो मतलबी होता ही है। अब उन्हें अपना जीवन एकांतवास में ही बिताना होगा। लोगों का, अपनो का, बच्चों का प्यार अब नहीं नसीब हो पाएगा।

जय प्रकाश मिश्र 









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