हार कर वह खुश तो है!

भाव: आज दुनियां खेमों में बंट चुकी है, समाज अपने विभिन्न घटकों जाति, धर्म, वर्ग, संप्रदाय, अर्थ के खांचों में बंटा हुआ है। ऐसे में आम जन, अंतिम व्यक्ति क्या करे! उसे इन सबसे अलग रास्ता अपनाना होगा और युक्ति अर्थात, तटस्थ और सजग जीवन जीना होगा। इसी पर कुछ लाइने आप के आनंद के हेतु प्रेषित हैं।

मैं बंद हूँ, जिस दौर में

वज्र... सी, 

दीवार... इसकी 

बहुत मोटी, चिन चुकी हैं,

टूट... जाएं, टूट.. पाएं 

अरे..! मेरे हाथ.. से

दीवार, ये...

संभव.. नहीं है..।

भाव: आज एक बालक के व्यक्ति होने से पूर्व ही उसके मस्तिष्क पर समाज, और अपने ही अनेक कठिन अपराजेय धारणाओं को इस तरह लाद देते हैं कि एक नोबल प्राप्त वैज्ञानिक भी लैब के बाहर साईं बाबा, और फकीर की दुआ से आगे नहीं सोच रखता है।

दरवाजा.. लगा, इस्पात.. का, 

हर तरफ, 

हर.. गेट.. पर...

सोचना.. भी गलत है, इसे लांघना..।

ताला लगा है, कठिन उस पर.. 

तोड़ना... उसको असंभव! 

पर चाभी.. बना कर, 

निकलना

इस.. दौर में भी, युक्ति का, 

आज भी, सबसे सरल है।

भाव: अब ऐसी स्थिति में, आप अपनी बुद्धिमत्ता और समझ से ही इन क्लिष्ट, अविजित संस्कार और व्यवस्था के समाज में अपना निसर्ग जीवन अपनी सोच को तटस्थ रखते हुए, सत्य के साथ जी पाएंगे।

जिंदगी बस यही है, 

ऐसे जिएं हम.. युक्ति से

आगे बढ़ें, 

मत लडे, ...बेकार... है, सब,

मत.. समय दें, इन सभी में,

आ गया, अब समय है, 

छोड़ सारे रंग हम, तोड़ सारे बंध हम! 

मिलकर चलें, 

चलो कुछ.. अच्छा करें।

जिंदगी में, प्रीति का, मिल.. रंग भरें।

भाव: नेता बनना, सुधार के लिए लाबिंग करना, जंजीरों को तोड़ने के लिए भारी दबाव पैदा करना ठीक नहीं है। दुनियां ऐसे ही है आप खुद अपने को ठीक रखें और समन्वय से जो अच्छा बन पड़े बिना कॉन्फ्रेंटेशन के करें।

जिंदगी एक महल है,

बहुमंजिली, 

कमरे... हजार!  

कुछ शब्द हैं, उन्हें ध्यान दें..

थाम लें, उन्हें ठीक से, 

वो खोल देंगे, 

सहज ही, 

हर कठिनतम से कठिनतम.. 

प्रत्येक द्वार..।

भाव: जीवन में सहजता, करुणा, प्रेम कुछ ऐसे शब्द है जो इसे इसकी सामर्थ्य दे देंगे आप इनको पकड़े। समस्या का हल यही हैं।

जीत जाना, 

जिंदगी भी.. हार है! 

पूछ लें, जीता है जो! 

खड़ा.. है, 

कुछ.. भी नहीं.. है, पास.. उसके..

गर बंद आंखे, लड़ा.. वो,

आज.. खाली हाथ है।

भाव: अन्याय के भरोसे जीतना जीत नहीं। जीवन में जीतने का मार्ग सम्यक सत्य का होना चाहिए।

हार कर वह खुश... तो है

कुछ... तो है,

पास.. उसके, गम.. तो है।

खाली है, वो... 

जो शिखर पर तन कर खड़ा है,

रास्तों पर गलत चढ़, 

जीता हुआ, टूटा हुआ वह... 

मरा सा, ही अधमरा है।

भाव: सच्चाई के रास्ते से चल कर हारा हुआ हारता नहीं, प्रायश्चित नहीं करता, जबकि बुराई अन्याय करके जीता आदमी जीतता नहीं वह पछताता ही है।

इसलिए 

मैं कह रहा हूँ..

थोड़ा रुको, देख तो लो

जीवन है, ये...., 

कभी.. भी,  कहीं.. ही,

अरे... इसको... जिओ..  तो! 


प्यार से उसकी सुनो, क्या कह रहा है

एक क्षण को शांत हो, 

जीवन है ये...

कुछ नहीं है, स्मृति है, 

अनुभवों.. की,  बटोर.. तो लो, 

कहीं..., रख..  लो, 

ठीक से,   तलाशोगे... !  

एक दिन...,  सच कह... रहा हूं! 

इकट्ठे... तुम, इन्हें... कर लो।


थोड़ा रुको..., देख.. लो

जीवन... है, ये..., 

कभी.. ही सही, 

इसे जी.. लो, थिर तो हो। 

भाव: जीवन में स्थिरता महत्वपूर्ण है। हमारे मानक स्थिर सत्य के साथ सदा रहें। अच्छाई के साथ बिताई गई असुविधापूर्ण जिंदगी ज्यादा फलदाई और संतुष्टि अंत में देती है। जीवन को इसके स्थायित्व में जिएं। विभ्रम जीवन को अंशों में बांट देता है। आनंद से हीन करता हैं

पग दो:  जिंदगी

एक खोज थी, ये जिंदगी

जद्दोजहद.. थी, 

उम्र.. की, 

समझा.. नहीं, मै आज तक

वो... चीज!  क्या... थी!  

जिसके.. लिए, आया.. यहां, 

मैं... इतनी, जल्दी..

नंगे.. बदन.... खुद सोचता हूं!

समय!  इतना भी नहीं था,

उस.. समय.. 

बहुत थोड़े.. ही सही,

कपड़े... पहनता, 

तब.. उतरता, 

आप.. सब.. के बीच, 

सच! प्रिय, 

मैं... इस धरा पर।

जय प्रकाश मिश्र


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