तन्मयी! से मिल तो ले ।
भाव: तन्मयी कौन! लौकिक परासत्य। सदा विद्यमान हर स्थिति, हर काल में, हर जीव, जंतु, प्राणि में और हर पदार्थ रूप में हर हाल में। आदमी की औकात उस तक नहीं, सदा छोटी और बौनी। इसी पर कुछ लाइने आप के लिए।
अब.., तुम क्या लिखोगे
गीत..
मेरे.. मीत,
आ! चल.. सुनाऊं...!
मेरे.. मीत,
आ! चल.. सुनाऊं...!
संगीत..!
तुमको, श्रेष्ठ.. प्रियतर!
इस.. प्रकृति का,
जीवंत.. है जो,
बांसुरी... से, और.. मीठा,
उड़ रही, इन बिहंगिनि, के प्रीति का।
बांसुरी... से, और.. मीठा,
उड़ रही, इन बिहंगिनि, के प्रीति का।
अन्तरार्थ: वास्तविक, नैसर्गिक, बिना शर्त का प्रेम, प्रकृति अपने प्राणियों से करती है। उसके प्राणियों के गान और गीत भाव लेकर, निष्कलुश कंठ से बहते हैं। हमारे गीत और भाषा उससे क्षुद्र ही रहेंगे।
सुर.. ताल.. में,
खुद.. देख कैसे! निकलता है
ठुठुर.. है ये..,
ठुमकता...है, ठुनकता..है!
कर्ण प्रिय है!
लय विलय कर, शब्द सारे
तोड़ सीमा.. अक्षरों की
तोड़ सीमा.. अक्षरों की
हाय! कैसे, यह.. बना है।
अन्तरार्थ: नेचर के जीवन गीत, ओरिजनल हैं ध्वनि-मात्र हैं, शब्द और मात्राएं वहां शक्तिहीन, असमर्थ होती हैं। जैसे अपनी अपार खुशी और पीड़ा शब्द से नहीं किलकिलाहट और आह से निकल जाती है।
मात्राएं,
नहीं रे! जागृत हैं, ये..
प्राकृतिक.. है,
सुन.. तो इनको,
मौन को, ये.. अरे! कैसे तोड़ता,
चिल्हकता, संदेश
है, बिन अक्षरों का।
अन्तरार्थ: सत्य की आवरण नहीं चाहिए, वह भाषा, ज्ञान और परंपरा विहीन होता है।
आरोह का अवरोह का
जरा ध्यान तो दे..
क्या छुपा है, सृष्टि में,
यह..
उसका... पता.. है।
अन्तरार्थ: प्राकृतिक आवाजें सत्य की प्रतिध्वनि हैं। अर्थ उनके पीछे होते हैं वह आगे रहतीं हैं। प्रसन्नता पहले भीतर होगी तो मुस्कान चेहरे पर बाद में आती है।
देख कैसे, हो गए हैं,
चुहुल.. ये
नवल रस ले, भर गए हैं,
नवल रस ले, भर गए हैं,
तरंगों.. से,
उमंगों से लद गए हैं,
घुल गई है, चुहल इनमें,
घुल गई है, चुहल इनमें,
देख, कैसे..!
सींचती... माधुर्य तन में
मन सभी का खींचते है,
मन सभी का खींचते है,
संग अपने।
रस कहां है! देख इनमें,
मधुरता कैसे छिपी है
शब्द में!
नहीं रे, विशिष्ट ध्वनि में!
अर्थ के विन्यास में
यह,
कुछ नहीं हैं,
भाव... हैं, बहते.. हुए।
अन्तरार्थ: प्रकृति के गीतों में माधुर्य और रस फलों की मिठास सा अनुस्यूत होता है। जैसे शरीर और आत्मा होते हैं। शाब्दिक अर्थ कुछ नहीं होने पर भी ये अपने अर्थ को स्पष्ट कर, हर प्राणी को बता देते हैं। जैसे बादलों की गड़गड़ाहट सभी को भयभीत ही करती है, आप कोई भी भाषा भाषी हो या जीव जंतु हो।
क्या... कह रहीं हैं,
नन्हीं.. चिड़ियां
पास तेरे बैठ.. कर, भाषा.. नहीं है
पास तेरे बैठ.. कर, भाषा.. नहीं है
पास इनके..
मात्रा नहीं है, ये लगाएं..
मात्रा नहीं है, ये लगाएं..
स्वरों पर
पर! खींचती है, भेदती है,
किलकती...;
कुछ कह... रही..
स्वर उठाती, पटकती.. हैं।
स्वर उठाती, पटकती.. हैं।
रसधार भर भर बोलतीं,
तन्मयी!
कर कर, हमे ये!
पास अपने, ध्यान को ले डूबती हैं।
पास अपने, ध्यान को ले डूबती हैं।
अरे कैसे!
उत्स! कैसा भर रही हैं,
भाव कैसे भर रही हैं
क्या जानती हैं, .. हमें ये..।
उत्स! कैसा भर रही हैं,
भाव कैसे भर रही हैं
क्या जानती हैं, .. हमें ये..।
अन्तरार्थ: इस संसार में सभी की अनुभूति एक सी होती हैं, और सबके रोने, हंसने, कराहने, खुश हो किल्किलाने आदि के स्वर और मात्राएं एक जैसी है होती हैं।
कुछ कह रही हैं,
सब अलग हैं, पर कैसे प्रिय हैं
कुछ कह रही हैं,
सब अलग हैं, पर कैसे प्रिय हैं
एक दूसरे को,
प्रेम से सब रह रही हैं
स्पष्ट है, कहने में सब
स्पष्ट है, कहने में सब
देख कैसे चिल्हकती हैं,
खोल उर.. सब रख रही हैं,
खोल उर.. सब रख रही हैं,
सामने हर एक के।
शब्द सारे पंडितों के मौन है
सच! इनके आगे,
कैसे मिलातीं
उच्च स्वर, अनलिखा,
अनपढ़ा,
अनपढ़ा,
ये निम्न स्वर से,
भिन्न है, कठिन है, सबकी समझ से।
भिन्न है, कठिन है, सबकी समझ से।
अन्तरार्थ:नेचर में जीवन संघर्ष है, यह सत्य है, पर वह मात्र जीवन रक्षा के लिए, हमारी तरह किसी को अकारण नुकसान के लिए नहीं। सभी लोग स्वर विज्ञान नहीं पढ़ते पर बोलते सभी एक से ही हैं। पेड़ पौधे अपनी प्रसन्नता और दुख को छुपाते नहीं, हृदय साफ और सच सामने रख जीते हैं। पानी खाद पाए मुस्कुराए नहीं तो मुरझाए बनावटी पन से दूर सत्य जीवन।
ध्वनि नियति की, प्राणियों की
दूर.. है, आज भी,
पहले के जैसी
इन अक्षरों से
आज जाना इन स्वरों से
बांध पाए आदमी, इन फ़ुदकनों को
आज जाना इन स्वरों से
बांध पाए आदमी, इन फ़ुदकनों को
स्फूरन को, कूक को,
कलरवों को,
संभव नहीं है,? संभव नहीं है।
अन्तरार्थ: मानव की सीमाएं हैं, बेड़ियां हम नेचर पर नहीं अपने पैरों में अपने भविष्य पर लगा रहे हैं। जगत प्रवाह में सहायक बने, शत्रुता अपने लिए ही घातक होगी।
मैं गीत तुमको हवाओं का
जिंदगी का सुनाता हूं
आज इन
कुंज गली की छावों में।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment