हक आदमी का आदमी को कब मिलेगा?

भाव: अभी कुछेक दिनों पहले यूरोप के अनेक देशों में अनेक गलत रीति नीति दुर्व्यवस्था थी, दास प्रथा थी, अफ्रीकी कुछ देशों में शायद आज भी  होगी। अन्यान्य अमानवीय कृत्य यूरोप के विकसित देशो के लोगों ने पिछड़े देशों के मूल नागरिकों पर वहां जाकर किए। अपनी कालोनी बनाई और उनकी पूरी कायनात को ही लगभग समाप्त कर दिया। बाद में मशीनीकरण और औद्योगिकीकरण से वहां काफी प्रगति हुई। अब वे उन लोगों के लिए घड़ियाली आंसू बहाकर स्मारक भी बनाते हैं। क्रांतियां भी कुछ देशों में हुई और वहां साम्यबाद आया। पर ढाक के तीन पात फिर वही पुनरावृत्ति दिखाई देती है। उन सदा से परेशान लोगों के लिए जो मात्र मनुष्य हैं विकसित और आधुनिक सभ्य नहीं, मेरे हृदय में कुछ शब्द हैं। आप भी पढ़ें और आनंद लें।

आधार... को 

भवन... की, इस नींव... को 

क्यों... छुपाया, हम सभी ने, 

इतने.. भीतर

साथ... मिलकर....

आदि से ले आज तक..

इतने दिनों तक... सतत, शाश्वत..

पूछता हूं! 

किस तरह से...जमीं में, 

देखना तो दूर..., 

वह... सुन भी न पाए

एक भी आवाज.. युग की.. 

कान से,

चुप चुप.. रहे! 

भार.. लादे पीठ पर 

वीभत्स तेरी सभ्यता का, मूल्य 

केवल वह चुकाए...

खड़ा होकर, अंधेरों में, धूप में, 

बरसात में,

हर... समय, वह सुरक्षा दे... 

खड़ा... रहकर, भूमि.... सोकर

हम सभी.. को, हर तरफ.. से...

क्या उसी का ही, काम.. था, ये..? 

क्या उसी का ही, काम.. था, ये...?


पूछता हूं! 

वह.. क्यों रहे, नेपथ्य.. में,

दिखे.. भी न, इस जगत को, 

देख पाए... वह किसी को, 

कभी भी न 

क्या इस लिए? 

गाड़ मिट्टी में दिया... था..

मिल.. सभी ने! इतने गहरे! 

अरे उसको..

समय की, उस तप रही, मरु भूमि में।

समय की, उस तप रही, मरु भूमि में।


सोचता हूं, पूछता हूँ! तुम सभी से..

और खुद से ।

कुछ तो बताओ, 

चुप पड़ा वह, इतने दिनों से..

वक़्त के मैदान में, किससे लड़े अब! 

क्या करे? 

ढह गई दीवार, तेरे सभ्यता की, 

आज... कैसे.., 

क्या इसलिए... 

सच! नींव इसकी हिल गई है! 

भव्यता का शिखर तेरे चमकता था

दूर से... क्या धूसरित हो 

काल कवलित हो रहा है, इसलिए! 

सोच इसको, स्थान दे, समुचित सभी को।

सोच इसको, स्थान दे, समुचित सभी को।


वह देखकर हैरान है,

यह व्यवस्था, 

घेर कर "सब" खड़े हैं, 

"सारी व्यवस्था"!  

है, कहां... खाली जगह 

वह...

घर बनाए...

बच्चों को रखे...

कुछ करे, तो... कैसे करे?  

कुछ उसको मिले... 

वह शुरुआत तो, 

एक जिंदगी की कर सके।

पीछे हैं क्या हम, इसलिए ही विश्व में? 

पीछे हैं क्या हम, इसलिए ही विश्व में? 


आदमी तो हम सभी है, 

एक ही इस देश के।

क्या आदमी हम सब नहीं है, 

एक ही 

इस देश के।


कौन होगा, 

त्याग जो कुछ कर सकेगा..

हक आदमी का आदमी को 

कब मिलेगा? 

हक आदमी का, आदमी को

क्या मिल सकेगा? 

जय प्रकाश मिश्र

मूल रचना को 'यह मूल रचना है' कहना उसको हेठा करना है। इसकी उभड़ खाबड़ शक्ल ही इसका प्रमाण है कि यह अनगढ़ है मूल रचना है।


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