एक.. चाह है, प्यास.. मन की...मिटती.. नहीं क्या करूं! ,

भावभूमि: नारी नियति का रूप, सौंदर्य, प्यार, करुणा, मातृत्व का इस विश्व को अनमोल उपहार! इन्हें हर चीज में माधुर्य और सुंदरता  पसंद ही नहीं उसे इसमें परिवर्तित करने की क्षमता भी सिद्ध है। उसके इस सौंदर्य प्रेम पर कुछ लाइने आप के आनंद हेतु प्रस्तुत हैं।

सौंदर्य की गति क्या.. कहूं!  
एक चाह... है, 
प्यास.. मन की...
मिटती.. नहीं, मिलती.. नहीं
यह.., 
कुछ भी कर.. लूं।

दिखावटी.. बनावटी... 
बस, बाड़.. है, 
कुछ भी रख लूं, रंग आकृति.. 
मगर, सुंदर.. आकर्षक.. 
थोड़ी हो,... फूल सी, 
पंछियों के, परों.. सी।
सौंदर्य की गति क्या.. कहूं!  
एक.. चाह है, मिटती.. नहीं, 
यह.., 
कुछ भी कर.. लूं।

महकती, 
मन.. घेरती, 
भेजती आमंत्रण मधुर
चुप.., चुप.. मगर, ना बोलती।
माधुर्य.. थोड़ा, ललक.. थोड़ी 
आकर्षन.. लिए 
हर अंग में...
रस.. घोलती, शक्कर बिना...
हर एक दिल... में,
कुछ इस तरह 
हर एक मन में  डोलती।
सौंदर्य की गति क्या.. 
कहूं!  
एक चाह.. है, 
मिटती.. नहीं, यह.., कुछ भी कर.. लूं।

चाहिए, 
कितनी.. मुझे,
मैं... जानती, खुद भी नहीं! 
थोड़ी सी, कम.. है, 
और मिल जाए, तो.. बेहतर, 
खोजती.. हूँ, 
रश्मियां... कुछ, बदलती..
लहरें.. हो उनमें, स्वतः उठती...
प्रवाल सी..।
कुछ मिल सके ऐसा तो
उसको साथ रख लूं
केशुओं में, 
कान में, मैं.. बाजुओं में 
पहन.. लूं।
सौंदर्य की गति क्या.. कहूं!  
एक.. चाह है, 
मिटती.. नहीं, यह.., कुछ भी कर.. लूं।

हर फूल से सुंदर दिखूं, 
और ताजा.. निर्मल.. मगन...
गगन पर हो राज.. मेरा
स्वर्ग से भी और सुंदर, 
घर बना दूं! 
चाहती.. हूं!  
मैं सौंदर्य प्रिय.. हूँ!  
तरल.. मन, मैं सरल... हूँ।

कठिन.. हूँ,  कैसे.. कहूं! 
प्रिय...!  
सबकी.. खातिर! भले.= हूं
तेरे... लिए!  
मैं...,   हद.. ही, नहीं.. 
दिल से नरम! हूँ ।
सौंदर्य की गति क्या.. कहूं!  
एक.. चाह है, 
मिटती.. नहीं, यह.., कुछ भी कर.. लूं।

सजा दूं, 
हर.. चीज को...
ये चाह... मेरी, पुरानी... है,
खुद को नहीं, बच्चों को अपने,
तुम्हे भी, मैं... चाहती हूँ,
घर.. ये तेरा, बाग.. 
तेरी, 
काबीन तेरा
जग... ही सारा, 
रूप.. इनमें, रंग... इनमें
प्यार.. का, हर ओर भर.. दूं 
चाहती हूँ।
सौंदर्य की गति क्या.. कहूं!  
एक.. चाह है, 
मिटती.. नहीं, यह.., कुछ भी कर.. लूं।

रूप हूं मैं, 
रूप.. देना जानती हूँ
हे! प्रिय मेरे,  नारी हूं मैं, 
मैं नियति को भी सजा दूं 
मांग भर दूं, 
इसके आगे क्या कहूं! 
सौंदर्य की गति क्या.. गजब है!  
एक.. चाह है, 
मिटती.. नहीं, यह.., कुछ भी कर.. लूं।

जय प्रकाश मिश्र


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