इस जहां को इन सभी से, बहुत जल्दी, मुक्त कर दे।

भाव: यह दुनियां स्वयं में हर चीज से परिपूर्ण है, जो चीजें यहां जीवन को सुखी और आनंद के लिए चाहिए थी उस नियति ने सब यहां प्रचुर मात्र में दी थीं। इस मानव को यह का इंचार्ज बनाया इसे बुद्धि दी, पराक्रम दिया, गुण दिया, प्रेम और करुणा दी की सभी को अपनी जिम्मेदारी मान सुख से रहेगा और एक नितांत न्याय पूर्ण वातावरण बनाए रखेगा। पर क्या हुआ मात्र अपनी दुर्बुद्धि के चलते और स्वार्थ में अंधा हो उसने अपने लोगों का ही नहीं सारे प्राणियों का जीवन और उस नियति का आज बंटाधार कर दिया। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए।

दुनियां ये क्या है! 


किसी.. ने लगाया, 

प्यार.. से, दुलार.. से

रोपा... समय से, 

एक.... पौधा! 


बहुत सुंदर.. 

नक्षत्र.... पर इस!  

शुभ कामना... से, बढ़ेगा..., 

फूल पत्ती, हरे..., पीले... 

इस पर... लगेंगे, सोच कर।


फल.. भी लगेगा, समय... पर! 

सब.. मिल इसे 

जल..., खाद... पानी...

जम... के देंगे, सुरक्षा सब मिल करेंगे।


हुआ... भी, 

क्या... पेड़ था! छतनार... 

फैला दूर तक

पत्ती हरी,  मोटी डाली  , 

तना... कैसा, बनठना... 

अद्भुत बना।


क्या कहूं!  

फूल... गुच्छों में लगे, 

हिल.. डुल.. रहे थे, क्या फ़िज़ा थी, 

गुल.. से गुलाबी, शमा... थी।


फल लटकते, 

बू... लिए, 

मन सभी का, हर... रहे थे,

पंछियों ने तिनके... बटोरे 

शौक... से, परिश्रम.. से।

आशियां.., सुंदर.. बनाया 

उसी... पे, 

अति... प्रेम से 

आंख.. भर भर लोग 

उसको... देखते थे।

 

शीतल, सुखद.. एक छांव थी,

बैठ जाओ एक पल 

यदि उसके नीचे...

उठ.. नहीं पाओगे, तुम.. 

इतनी अच्छी...,  ठांव.. थी।


इतनी... तरावट, शांति.. थी।

प्रसन्नता खुशियां सभी की 

हर तरह आबाद थीं। 

उस पेड़ में अरमान थे, 

लटके हुए, सिले... सबके..

कोई कुछ कहे!  

खुश हाल थे,  हर एक तपके।


पर... क्या हुआ! 

एक... दिन, पास... का 

समृद्ध, सबसे..., शीर्ष... का

आदमी... वह आ गया! 

जो.. सजग था हर, दृष्टि से, 

अपने लिए 

बस... अपने, लिए! 

खड़ा... हो, देखा... इसे।

बड़े... ध्यान से,

आरी... मंगाई काट दी 

हर.... डाल इसकी! 

बोलता था, 

खतरा ये था, उसके लिए! 


कोई क्या करे? 

समृद्ध... था, शीर्ष... पर था,

विज्ञान... से वह, पुष्ट... था,

अभिमान.. था, 

रौब... भर कर चल.. रहा था।

रौब... में सब कर रहा था।


रो... रहे थे, आदमी वे, 

गरीब.. थे, नेटिव्स.. थे,

बेबस.. पड़े थे, 

कानून को नहीं जानते थे

वे.. बस, आदमी.. थे,

आदमी... से, ऊपर... नहीं थे।


कम.. लिखपढ़े थे। 

पंछी.. सारे, तड़पते.. थे,

बेघर हुए थे, बच्चे उनके, 

मर... गए थे

दुर्दशा उनकी बहुत थी जो

जमीं पर बिलखते, 

दुख दर्द सहते, घायल पड़े थे।


देखते सब खड़े थे, क्या करें? 

कैसे भिड़ें.. 

रास्ता ही था नहीं, किससे कहें! 

प्रार्थना, उन ईश से वे कर रहे थे..! 


किस चीज की!  क्या सुनोगे? 

बस.... सदबुद्धि की,

इन समर्थों को, शीर्ष को, 

वह इन्हें दे दे।

या वह 

इस जहां को इन सभी से, 

बहुत जल्दी, मुक्त कर दे।

जय प्रकाश मिश्र

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